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मंगलवार, 18 जून 2013


------------जान बेवफा निकली -----------

तुमने अपनी कमजर्फी को बता दिया "तकदीर खफा है "
उस "सच्चे "का कौन सहारा जिसकी 'जान ' 'बेवफा ' निकली ? 
रेशा रेशा तार हो गया , गुरिया गुरिया चूर हो गयी
दोजख दोजख बनी जिन्दगी , जिसकी जान बेवफा निकली .        
अगर कहीं ईश्वर दिख जाए , पकड़ गरदनी उसकी पूंछो
"तूने भोगा दर्द किसी का , जिसकी जान बेवफा निकली ?"
धज्जी धज्जी कपडे पहने , मतवाला सा घूम रहा है
मुर्दा बेटे की माँ जैसा , जिसकी जान बेवफा निकली .
नौजवान बेटे की अर्थी , अपने सीने से लिपटाए
पडा हुआ है बीच सड़क पर , इसकी जान बेवफा निकली
मंडप के ही नीचे जिसकी मांग लुटी सिंदूर लुट गया
वह अभागिनी विधवा देखो जिसकी जान बेवफा निकली
                -------------Kishore Nigam/ 13-06-2013