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रविवार, 10 जून 2012

मैं और तुम

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शून्य से उपजा था जिस क्षण,
शून्य से उपजा था जिस क्षण,
तुम्हारा वह गरिमामय तन
तुम्हारा सहयोगी का रूप
... तुम्हारा सह्भोगी का रूप
तुम्हारी पायल की रुनझुन
तुम्हारे अभय पदों की धुन
तुम्हारी निश्छल मोहक हंसी
तुम्हारी चितवन अर्थपगी
मनुज को ले जाती उस ओर
आदि और अंत जहां एक ठौर
जीव और ब्रह्म जहां पर एक
समष्टि व्यष्टि जहां अभेद
काल और दिक् का बीज बने
सर्व आयाम हमीं में घने
अर्धनारीश्वर मैं और तुम
तुम्ही मैं बने, और मैं तुम
वायु के सघन कणों से हम
कर्म और ज्ञान व इक्षा शम

तभी कुछ हुआ व्यतिक्रम एक
एक से बने द्वैत सविवेक
उनीदित सी आँखें खोले
भ्रमों का कीटजाल ओढ़े
देखते कुछ दिखाते कुछ
चाहते कुछ तो करते कुछ
प्रकृति ने दिए हमें अभिशाप
जीव ने भोगे जो अभिशाप
ब्रह्म ने भरमाया दिन रात
जगत ने पत्थर मारे घात
विकल बेकल विह्वल क्षोभित
यज्ञ में जले सर्प पीड़ित
रेंगते हैं जीवन के लिए
जिन्दगी खड़ी दंड है लिए
मृत्यु उपहास उडाती है
प्रकृति धर धर ठुकराती है

सोचता हूँ मैं अब इस क्षण
कौन था मैं कौन थे तुम
नहीं तुम तो कोई परिचित
सिर्फ तुम पिंडों से निर्मित
तुम्हारा वह आकर्षक रूप
तुम्हारा अकथ अलौकिक रूप
मात्र मेरी ही कल्पना थी
मात्र मेरी ही जल्पना थी
पिंड में देखी जो आत्मा
मात्र मेरी ही अल्पना थी

                                     Kishore Nigam /26/12/1974

"मन के है धारे दो ,

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मन के है धारे दो , 

मन के है धारे दो                                                          
एक अपना आप,
एक प्राप्ति की अभीप्सा
मेल नहीं खाते
अपना आप और अपनी अभीप्सा
उसका अपना आप , अपनी चाहत
मेरा अपना आप आप , अपनी चाहत
मेल नहीं खाते
मेरे और उसके अपने अपने आप
चाहतें भले ही खा जाती हैं कभी मेल
कभी हम चाहतों को चुनते हैं
और कर लेते हैं अपने आप को बदरंग
कभी हम अपने आपे को चुनते हैं
और कर लेते हैं अपनी चाहतों को बदरंग
ईश्वर  ने बनायीं ही प्रकृति है ऐसी
 
कि  जहां मिलती है पनाह ,
दर्द भी वहीँ मिलता है
साझा रिश्ता है जैसे इन दोनों का
"


                                                 Kishore Nigam /25/04/2012

डूब आया मैं लहरों में ।




छोड़ सब भौतिक द्वंद्वों को

साथ लेकर पीड़ित मन को ,
डूब आया मैं लहरों में ।

कहाँ अब कुत्सा का वह जाल
कहाँ अब छलना का वह व्याल
कहाँ वह मन की तड़प कराल
कहाँ करुणा का छल छल ताल
उठा , सब को समेट ,रख अलग,
विहंस जागा तंद्रित अलसित ,
डूब आया मैं लहरों में ।

ताल में प्रतिबिंबित सुविशाल
सुदृढ़ मंदिर का गर्वित भाल
लहर में ज्यों बल खाता व्याल
कौन क्या --- कब गिनता है काल ?
सुदृढ़ता मन की सारी तोड़ ,
ध्वंश को निश्चिन्ता से जोड़
तैरता हूँ मैं लहरों में ।

प्रखर सूरज का तपता भाल
करे उसको मज्जित यह ताल
अभी तक वही रहा था शाल
बना पर आखिर पयस-मराल
छोड़कर सहज सूर्य का ताप
जलज की कोमलता ले साथ
काँपता हूँ मैं लहरों मैं

न कल होगा यह जलमय ताल
तप्त हो जाऊँगा तत्काल
प्रखरता रवि की जल में डाल
बनूँगा फिर लहरों का जाल


"चक्रवात भावों का उद्वेग
नहीं ऋजु जीवन की यह रेख
चक्रवात घटनाओं का लेख
पाप में पुण्य ,पुण्य में पाप
निहित दिखलाते सब अभिलेख
क्षणों में जीते हम निरुपाय
संस्कारों से पीड़ित हाय
नयी पीढ़ी अब चिंतित नित्य
एक जीवन की गति ही सत्य
मृत्यु है अंतिम जिसका लेख "
यही लेकर असार का सार
इसी दर्शन का लेकर भार
डूब जाता हूँ लहरों में
                                  Kishore Nigam /
                                 
Faizabad/             07/08/2012

ऐ सहरा के कैक्टस !

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कैक्टस (नागफनी )


"ऐ सहरा के कैक्टस !
कैसे कह सकते हो तुम "अमीत"
मैं भी तो हूँ इस सहरा में तुम्हारे साथ
न तुम तनहा हो , न मैं अमित्र
जो काँटा चुभाया है ,तुमने
क्या नहीं था वह
मित्रता के बढे हाथ का प्रतीक ?
तुम्हारी प्यास अधूरी है !
किन्तु इस अपार रेत- राशि के नीचे दबे जल- बिंदु
तुम्हारे जीवन को बनाए रखने के लिए ,
धरती के सबसे सुन्दर पुष्प तुममे खिलाने के लिए
दे रहे हैं तुम्हें सतत अपना जीवन-दान
क्या इस स्नेह से अधिक भी है कुछ वांछनीय ?
देखो तो मेरी ओर
जिसके प्यासे तड़पते होठों को
नहीं मिल सका जल का एक बिंदु
हर क्षण बढती यह प्यास
ले जायेगी जीवन के उस पार
नहीं जानता- क्या वहां भी होगी बस
प्यास ही प्यास
किन्तु बुझती आँखों में उस क्षण
रहेगा कृतज्ञता-भाव का एक जल बिंदु !
कृतज्ञता इस कांटे के रूप में
बढे हुए तुम्हारे
मैत्री के हाथ के प्रति ।
खारा ही सही , वह जल बिंदु ,
किन्तु आशा है बढ़ा देगा
तुम्हारे जीवन कि डोर को
कम से कम एक क्षण और
ऐ इस सहरा के मेरे मीत
सार्थक हो जायेगी हमारी प्रीत ।"

मैंने दी हैं निमौरियाँ ,औषधियों की स्रोत हैं जो

दाता कभी भिक्षुक नहीं होता ,अधिक से अधिक अपने दान का प्रतिदान मांगता है


मैंने दी हैं निमौरियाँ ,औषधियों की स्रोत हैं जो
घनी छाया,शीतल पवन , चौपाल को और पंथियों को
दिए हैं घोंसले मैंने, भटकते पंछियों को ।
द्वार , खिड़की , कुर्सियां, ये मेजें और अलमारियां
सब बना लो, सब सजा लो, निष्प्राण होती देह से ।
जब कभी तपती दुपहरी की तपन बेचैन कर दे
देखना आषाढ़ के पहले दिवस सी आश देते
मेरे बीजों से उगे ,इन मेरी छाया में पले ,
प्राकृतिक वर्षा से, माता भूमि से पोषित हुए
सर उठाये गगन में ,नव -वृक्ष नव पल्लव धरे
ये तुम्हारी आश होंगे, ये तुम्हारे पास होंगे
ये तुम्हें उल्लास देंगे, ये तुम्हारी सांस होंगे, ।
जो नहीं उपयोज्य है , गन्दला सा एक लोटा जल
बस वही दे दो इन्हें ,उपकार के उपलक्ष्य में
यह तुम्हारा कृत्य बस सहयोग का वाचक बने
मान रह जाए तुम्हारा , और इन्हें जीवन मिले ।।