रात की काली परतों सी , सघन स्मृति की रेखाएं
उठाती धीरे धीरे मुझे तुम्हारी विजड़ित सी स्मित |
निराशा भी पाऊँ कैसे, न आशा ही उपजी हो जब
विफलता भी क्यों देती साथ, सफलता की न चाह हो जब |
तुम्हे पाया, तुम्हे खोया, तुम्हारा संग विरह का गीत
तुम्हारा मौन निमंत्रण कभी, आज तक बना न मेरी जीत |
युगों से दूर, जगत के पास, पहुँचता जब जब मेरा हाथ
न मिलता कभी सहारा मुझे, उठा निष्फल ही मेरा हाथ -----
उठा निष्फल ही मेरा हाथ ----
--------- Kishore Nigam
