पृष्ठ

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

तुम कहाँ से आ गए हो यहाँ पर ?


 
दमनकारी सामाजिक,अन्धविश्वासी  धर्मांध, प्रगतिरोधी धारणाओं से प्राप्त उत्पीडन से जनित क्षुब्ध
निः श्वांस :-----

कौन हो तुम ?                                  

तुम कहाँ से
आ गए हो यहाँ पर ?                     
यहाँ पर, जीवन जहां पर सड़ रहा है
यहाँ पर तीखा धुवाँ धुंधुवा रहा है !
लिजलिजे विषधर यहाँ पर घूमते है
डंक वृश्चिक भी उठाये झूमते है !

टूटता है नीड़ उल्का पात से
घोर रव से चटकती है सब शिलाएं
विष गगन बरसता है

रक्त मुँह से चन्द्रमा भी उगलता है !
सूर्य की छाती जमी हिमपात से
और वृक्षों की शिखाएं जल रही हैं !
पिघलकर उडगन टपकते अंध तम में
घुस रहीं जलती सलाखें पुतलियों में !
उड़ रहे पर्वत उठाये पंख अपने
बाढ़ में सब गाँव , सारे बह गए हैं !
पंछियों को भूनता है व्याध निर्मम
रक्त सारी नसों का पानी बना है !

भाग जाओ , भाग जाओ , क्यों खड़े हो ?
कौन हो तुम ? क्यों निरर्थक जल रहे हो ?
तुम कहाँ से आ गए हो यहाँ पर ?
तुम कौन हो ?
                                     Kishore Nigam /26.12.1974


गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

स्मृति की धूमिल रेखाएं





स्मृति की धूमिल रेखाएं
, चम-चम विद्युत् सी चमक उठें ,
करुणा, तृष्णा, भय ,मोह ,क्रोध , आनंद-मेघ बन घहर उठें।,
छल- छल एकाकी जीवन-नाद , कल-कल स्वर में लहरा उट्ठे ,
मृदु-भाव- सुधा वर्षण हो, मानव-मन जिसको पी विहंस उठे ।
कुंठा, अवसाद, घृणा , तृष्णा ,करुणा ले मानव-मन आये ,
समरस भावों का रस पीकर , रसमय हो शांति सुधा पाए ।।
...............Kishore Nigam May/1973

मैं प्रपात महा जल का !


मैं प्रपात महा जल का !                                               


कल्पना की नील स्वर्णिम
परी का आँचल नहीं हूँ ।
और न ही कल्पना का
मैं भयानक दैत्य हूँ ।।

वास्तविकता के धरातल पर उमड़ता ,
दृढ़ शिलाओं पर उफन कर चोट खाता ,
तोड़ता मैं रूढ़ियों को ,
स्वयं को बिखरा रहा हूँ !
ऊंचे हिमालय से हजारों हाथ नीचे ,
ह्रदय का भय दमन करके ,
बेझिझक मैं कूदता हूँ ,
अधः गति में चल रहा हूँ ।
कल्पना की नील स्वर्णिम
परी का आँचल नहीं हूँ
और न ही कल्पना का
मैं भयानक दैत्य हूँ ।।

यह अधः गति ,पहुँच समतल में सरित का ,
रूप दे देगी मुझे उपयोगितामय ।
यह अधः गति सींच खेतों को कभी ,
शस्य- श्यामल भूमि देगी जगत को ।
यह अधः गति ही पहुंचकर अंत में
महासागर अंक भी देगी मुझे ।
यह अधः गति निरर्थक जीवन अपाकृत
को बना देगी सनिश्चय सार्थक ।
तोड़ता मैं रूढ़ियों की जड़ शिलाएं , कूल-बंधन ,
उस अपरिमित पुनर्जीवन की दिशा में बढ़ रहा हूँ ।
कल्पना की नील स्वर्णिम परी का आँचल नहीं हूँ
और न ही कल्पना का मैं भयानक दैत्य हूँ ।।

रोक कब मुझको सका ,यह जगत निर्जन निरर्थक सा,
बाढ़ में हर बाँध को मैं तोड़ता बढ़ता रहा हूँ . ।.
जब कभी मैं बंधा सीमित से क्षणों को ,
शक्ति के आह्लाद का संचार मैं करता रहा हूँ ।
सूर्य ने बेंधा सहस्रों बाण से जब ,
विश्व पर मैं मेघ बन कर छा गया हूँ ।
और सत्ता सूर्य की भी ढांप कर कुछ क्षणों को ,
ओस, कुहरा, मेघ बन बरसा किया हूँ .।
इन्द्रधनु बन बंधनों में भी विहँसता ,
शांति से मिट, बरस , फिर नद बन गया हूँ ।
कल्पना की नील स्वर्णिम परी का आँचल नहीं हूँ
और न ही कल्पना का मैं भयानक दैत्य हूँ ।।

.................... किशोर निगम /२४.१२.१९७४

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=310903795672811&set=a.131199796976546.26267.100002595789134&type=1&theater

रचनाकार कौन ?

रचनाकार कौन ?


गलत कहते  हैं  लोग  
कि मैं , तुम  या वह रचनाकार  है  ।
रचनाकार  हैं
युगों  युगों  से  मानव  मन  पर
संचित  होते  असंख्य   प्रभावों  के ,  
घनीभूत असह्य क्षण .
रचनाकार हैं
युगों  युगों  से  पिए  जाते,
विष  और  अमृत  के
परिणामी प्रभाव  
जीव की सहन क्षमता को
अतिक्रमित करके  जो ,
वमन करा देते हैं .
रचना  है  वह  वमन  । .
रचनाकार  है  प्रकृति  और  परिस्थितियाँ
और  उनका  द्वंद्व  ।
रचनाकार  है
जीवन  की  गति  के  निर्णायक  क्षण
पकड़ कर युग के रथ का धुरा जो
हजारों वर्ष आगे-पीछे , खींच ले जाते हैं  ।
रचनाकार है वह क्षण ,
जो युगों युगों से भोगे गए ,
एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में संक्रमित ,
घटते बढते परिणामी प्रभाव  को
शिव  के  नीलकंठ  या  चाँद  की  हँसी  की
के रूप में प्रकट कर देता है ।
द्विक -आकर्षण  है  रचनाकार
और  शिशु  रूप  में  रचना  जन्म  लेती  है  ।
रचनाकार  है द्रौपदी -चीर-हरण,
पांडवों  का  राज्य-हरण  
महाभारत के रूप में रचना प्रकट  होती  है  ।
             ...............रचना तिथि : २४.०९.१९८२
             ..............सम्पादित/संसोधित : ११.०९.२०१२
https://www.facebook.com/pages/Satya-Kishore/275039235935734?ref=ts&fref=ts

मिठास कहाँ गयी ?

मिठास कहाँ गयी ?                                         


"तुम्हारे हाथ के
इतने मन से बनाए गए भोजन में ,
वह महक, मिठास , ताकत और सोंधापन
कहाँ चले गए ,
जो उस जंगली फल में थे ,
जिसका एक टुकड़ा तुमने दिया था मुझे कभी ,
पहले खुद चखकर .
बदले में मैंने तुम्हें दिया था वैसा ही ,
पूरा फल ........ सूंघकर ? "

बहुत देर सोचकर , उदास लहजे में ,
तुमने जवाब दिया --
"हमारी शादी को बहुत साल हो गए "

मेरे हाथ कानों पर चले गए .
सोचता हूँ -- कागज़ पर लिख दूँ --
"शादी तो हमारी हुयी ही नहीं
हुआ केवल फलों का लेन-देन . "
(क्या बिना समझे , पंडित, मौलवी,पादरी के
शब्दों को दोहराना, सर हिलाना ,
सोते सोते ,गिरते -पड़ते ,मंडप में चक्कर लगाना ,
अनचाहे, अनजाने कागजों पर हस्ताक्षर करना ,
शादी हुआ करती है ?
शादी तो है एकत्व की अनुभूति ,
और उसे अमर बनाने का दुतरफा संकल्प
सामाजिक उत्सव का अर्थ तो शादी नहीं )
वह फल भी तो लिए-दिए गए थे
हजारों साल पहले ,
जब हम कपडे पहनना नहीं जानते थे
और तुम बहुत बलिष्ठ थीं ,
शायद मुझसे ज्यादा .
आत्मिक रूप से .
छूकर तुम्हारे होठों से और मेरे हाथों से ,
भर गयी थे उन फलों में ,
विश्वास की ताकत, सच्चाई का सोंधापन ,
एक दूजे के हो जाने की भावना की मिठास ,
और नया कुछ करने की तरंग की
महक भरी हुलास ।

पर अब,
अब तुमने वह सारी पौष्टिकता
सोंधापन और महक ,
धो डाले हैं
तथाकथित संस्कृति-सभ्यता-परंपरा-प्रथा
अविश्वास- छल-प्रवंचना के खारे पानी में
किटी-पार्टी, मर्दों की निंदा ,
सोसल साइट्स के अप्डेसन में
स्टेटस के रखरखाव में .
अब तुम बहकी हो "आज़ादी" की मृगमरीचिका में
और मैं , तुम्हारी चाकरी में .
मिलकर कुछ नया करने को दुनिया के लिए,
दिमाग के किसी कोष्ठ में कुछ बचा ही नहीं
अब तुम्हारे हाथों और होठों में
चिपका है बस यह खारापन ,
इसीलिए मैं भी जो फल देता हूँ ,
वह भी मीठा न लगकर , ,
कसैला तुम्हें लगता है,
और तुम्हें इसमें भी
विष का भय दिखता है. ।
.............किशोर निगम/रचना तिथि : २३.०९.१९८२
................संसोधन /संपादन : १०.०९.२०१२
https://www.facebook.com/pages/Satya-Kishore/275039235935734?ref=ts&fref=ts

सोमवार, 20 अगस्त 2012

मस्तिष्क में है एक अंधड़ व्याप्त होता

भाव वातचक्र

( भ्रष्टाचार, अन्याय, अत्याचार, पाखंड, छल, द्वेष, दंभ, संवेदनहीनता के विरुद्ध )

मस्तिष्क में है एक अंधड़ व्याप्त होता
जीवन-जगत के क्षेत्र में भी यदि कहीं वह उतर आता
विश्व के अगणित ह्रदय का शूल बनकर
सकारण वह रूद्र का त्रिशूल बनकर
विश्व-अंतर में धंसकता l
सम्पूर्ण स्थावर जगत पावक महार्णव एक बनता l
और जंगम सब जगत, उस पर लटकते
क्षीणतम रज्जुका-कृत हिंडोल पर
भयभीत होकर, त्रस्त होकर
झूलता रहता l
और मैं --
मेमने का वधिक बनकर, सकल जग को
निज भयंकर अट्टहासों से गुँजाता l
ब्रह्माण्ड के प्रत्येक अणु में
मैं महाव्यापक- विराट- स्वरुप होकर
महा कुत्सितता समेटे
हँसता , चिल्लाता
और अट्टहास करता l
 ......................Kishore Nigam / January, 1970 

मैं अनंत का पथिक !



https://www.facebook.com/pages/Satya-Kishore/275039235935734

 

मैं अनंत का पथिक !


मैं अनंत का पथिक, यहाँ कैसे रुक जाऊं ?
मौत मेरी संगिनी-चिर , नित-नवेली, यौवना-नव ,
चिर-सुहागन, दूर पर , घूघट उठाये ताकती है
मुझे जाना प्रियतमा तक, मंद पग कैसे मैं कर लूँ ?
मैं अनंत का पथिक, यहाँ कैसे रुक जाऊं ?

ओ जीवन की सुकुमारि- नारि ! तुम तो केवल पथ-निर्झर हो
मैं महाशून्य का महाराज, तुम तो क्षणिका की दासी हो
तुमको अर्पण कर यह जीवन , क्यों मैं अपना मान घटाऊँ ?
मैं अनंत का पथिक, यहाँ कैसे रुक जाऊं ?

मैं श्रांत पथिक , इस कुटिया में , दो क्षण को निद्रा-सुख ले लूँ
तू द्वार बंद कर मत अपना , मैं दो क्षण यहाँ शरण ले लूँ
पर भूल प्रिय को , कैसे तेरा पंकिल आँचल थामूँ ?
मैं अनंत का पथिक, यहाँ कैसे रुक जाऊं ?
 
                         ...........Kishore Nigam / 18.02.1974 

गूंजती पदचाप तेरी कर्ण में रह रह मुखर सी

लोकोत्तर पदचाप


गूंजती पदचाप तेरी कर्ण में रह रह मुखर सी

कौन जाने पग तुम्हारे शून्य में कैसे चलेंगे
कौन जाने किस तरह मरुभूमि पर बादल घिरेंगे
अस्तित्व भी तेरा नहीं युग प्रस्थ पर ए मानसी
गूंजती पदचाप तेरी कर्ण में रह रह मुखर सी


नहीं सत्ता कभी तेरी कहीं थी न अभी है
पर मुझे स्पष्ट ही तू सदा दिखती रही है
कोमल चरण को भूमि पर रखते हुए , डरती हुई सी
गूंजती पदचाप तेरी कर्ण में रह रह मुखर सी

हूँ प्रतीक्षा रत , प्रतीक्षा में प्रतीक्षा बन गया मैं
कभी जीवन बह रहा था, आज तो जड़ बन गया मैं
मौत के भी बाद जड़ आँखें प्रतीक्षा में खुली सी
गूंजती पदचाप तेरी कर्ण में रह रह मुखर सी

शून्य है चहुँ और मेरे , शून्य है अन्तः करण में
शून्य है सत्ता जगत की , शून्य ही मैं बन गया हूँ
शून्य में तू शून्य बन , इस शून्य पर हंसती हुई सी
गूंजती पदचाप तेरी कर्ण में रह रह मुखर सी
                      ...........Kishore Nigam / 18.02.1974 

क्रांति के गीत गा ओ मुखर भारती !


"समग्र क्रान्ति " के प्रति ...........

 https://www.facebook.com/pages/Satya-Kishore/275039235935734

 क्रांति के गीत गा ओ मुखर भारती ! नव किरण पुंज तेरी करे आरती !


बह रहा है लहू, रक्तमय है धरा , आज शोणित नसों का गगन व्याप्त है
छिप रहे है नखत चन्द्र, सन सन पवन, ,तेज को साथ ले हो रहा तप्त है
आज धरती पहनकर चुनर रक्त की , वीर- बलि से सजी बन रही है दुल्हन
भोर की छोर से उठ रही है किरण , वीर बाला बनी है नवेली दुल्हन
आततायी के क़दमों को रोको , बढ़ो ,और विजयश्री वरो, कह रही भारती
क्रांति के गी
त गा ओ मुखर भारती ! नव किरण पुंज तेरी करे आरती !


पूर्व में है कलरव विहग वृन्द का , रक्त आभा उभरती नए सूर्य की
मृत्यु प्याले छलकते लिए हाथ में , वीर बढ़- बढ़ पकड़ते चुनर मृत्यु की
रो उठा है कहाँ स्यार गर्जन को सुन, सिंह अंगडाईयाँ ले रहा है नयी
मस्त गज चल पड़ा है नए पंथ पर , भौंकते स्वान उनकी खबर कुछ नहीं
उठ पड़ो, उठ पड़ो, -- कह रही है धरा , कह रही है दिशा , कह रही भारती
क्रांति के गीत गा ओ मुखर भारती ! नव किरण पुंज तेरी करे आरती !

आज मन की सभी त्याग कमजोरियां , उठ पड़ो ओ जलधि ! फिर नए ज्वार ले
आज छाया है नभ में ये सावन का घन, नाच दे ऐ मयूरी नए जोश से
आज आई नयी पूर्णिमा क्रान्ति की ,ओ खिलो चंद्रमुख- पुष्प , नव गंध ले
फिर दिशायें नयी दे रही हैं दिशा , चल पड़ो मन में फिर एक नया ध्येय ले
बढ़ चलो , बढ़ चलो, -- कह रह है पवन, कह रही चेतना, कह रही भारती.
क्रांति के गीत गा ओ मुखर भारती ! नव किरण पुंज तेरी करे आरती !
                          .................किशोर निगम/ ०५-११-१९७४

दिन है चुन चुन अँधेरे समेटने को

To some one in frustrated life and confused in glamour:- 

 दिन है चुन चुन अँधेरे समेटने को


दिन है चुन चुन अँधेरे समेटने को
रात है उन में ग़ुम हो जाने को
रंग दुनिया में जितने हैं गिन लो
रात में हैं  सब एक रंग होने को
लोग पीते हैं गम भुलाने को
ये बनी है पर, गम में डुबा देने को
महफ़िलें जल्दी टूट जाएँगी,
जवाब दोगे तब क्या तुम अपने अपने को ?
आहटें आज सुनी तुमने कल के आने की
खुद को तैयार करो कल को जवाब देने को ।
         ..... किशोर निगम / ०३.११.२०११

https://www.facebook.com/pages/Satya-Kishore/275039235935734

मोती हैं सहेजने के लिए......



टूट  जाते  है  मोती  बिखर  कर,  पिरोई  माला  से
वो  गले  के  मोहताज  नहीं  होते
ख़ूबसूरती  बिखेर  देते  है  हर  जगह  अपनी  रौनक  से
                                  ..................अज्ञात

मोती हैं सहेजने के  लिए......


मोती हैं सहेजने के  लिए , बिखेरने के लिए तो नहीं
वो अंगूठी में सही , झाले में सही , माले में न सही
बिखरे गर धूल में तो , फूल हो या मोती हो ,
कीमत है धूल ही बस , और कोई कीमत तो नहीं ,
मोहताज यहाँ कोई... किसी का भी नहीं हो सकता ,
तुम किसी के जो नहीं , कोई तुम्हारा भी नहीं
कहकहों को भूल से ,न प्यार की थपकी समझो
उनके दुःख अपने है , छल अपने है , तुम्हारे तो नहीं  
जिसके घर अपना दिया , तेल बिना सूना है
दूसरों को रौशनी दे , खूबसूरती दे ,--मजाक तो नहीं ?
जिसको एक प्यार की सौगाध मिले , उसके लिए ,
वाहवाही का समंदर भी , एक बूँद से ज्यादा तो नहीं .
         ..................किशोर निगम / ०४.११.२०११


https://www.facebook.com/pages/Satya-Kishore/275039235935734

नैसर्गिक अभीप्सा

 https://www.facebook.com/pages/Satya-Kishore/275039235935734

नैसर्गिक  अभीप्सा


बाँध लो  फिर  कुन्तलों  में    आज  मेरी  सूक्ष्म  सत्ता
आज  मदरस  बना  मुझको , नयन  में  फिर  से  समा  लो

आज  बनकर  रक्त  मैं  दौड़ा   फिरूँ  तेरी  नसों  में
आज  रोमावलि पुलक  में  दौड़  जाऊं तव  बदन  में
आज  थिरकन  बन  तेरी  त़ा  थेई   तत  तत  नाच  जाऊं
आज  कम्पित  स्वांस  में  तव  श्वांस   बनकर  समा जाऊं
लीन कर  लो  मुझे  खुद  में  आज  "मैं " को  "तुम " बना  लो
आज  मदरस  बना  मुझको , नयन  में  फिर  से  समा  लो

ओ  सुधाकर ! मैं  सुधामय  चांदनी  बन  जाऊं  तेरी
ओ  दिवाकर  ! रश्मियाँ  तेरी  बनूँ  मैं  ज्योति  पोषक
श्वांस  तेरी  मैं , मेरा  हर  रोम  तुझमे  हो  समाहित
आज  पावक  और  ऊष्मा  सा  हमारा  साथ  हो
आज  समरस  हों  यहाँ  तक , "द्वैत " को  "अद्वैत " कर  दो
आज  मदरस  बना  मुझको , नयन  में  फिर  से  समा  लो

ओ  ! झनकती  तडकती  विद्युत् -लहर  बन
मुझ  सघन -घन - अंध  में  तुम  समा  जाओ
ओ  छलकते  किलकते  निर्झर  उच्श्रंखल !
मुझ  महानद -अंक  में  अब  आ  भी  जाओ
आज  आ  आगोश  में  तुम  स्वयं  को  मुझमें  समा  लो
आज  मदरस  बना  मुझको , नयन  में  फिर  से  समा  लो
                          ............. किशोर निगम / ०४.११.१९७४


चाहिए अन्धकार, प्रकाश नहीं मुझको

नितांत व्यक्तिगत (शायद किसी और का भी हो, उसके लिए)


चाहिए अन्धकार, प्रकाश नहीं मुझको


यह जलता प्रकाश
यह उच्श्रंखल प्रकाश
जलता है
जलाता है
मुझको और सबको
पड़कर इन चक्षुवों पर

घायल इन्हें करता
बेकार कर देता है

बुझा दो , बुझा दो इन जलते हुए दीपों को
हठीले दीपों को , जोशीले दीपों को
शान्ति की जरुरत है, नीरव की जरुरत
बेहतर है अन्धकार ही बना रहने दो

अन्धकार स्वयं में ही कोमल है, शांत है
किन्तु यह प्रकाश, इससे मन उद्भ्रांत है
भटकन नहीं, तड़पन नहीं, कोलाहल भी नहीं
चाहिए अन्धकार, प्रकाश नहीं मुझको
                                           किशोर निगम .... ०६.०८.१९७२ 


                        https://www.facebook.com/pages/Satya-Kishore/275039235935734

बदलो एक एक परिभाषा

कोई आग्रह नहीं , कोई सलाह नहीं , बस एक विचार , जो शायद कुछ सोचने को प्रेरित करे :---

 बदलो एक एक परिभाषा

"धर्म" छलाओं का हुजूम है ,
"नैतिकता " समूह-सम्मोहन
"प्रेम"द्रोह की परा काष्ठा ,
"प्रजातंत्र" भेड़ों का रेवड़
"दम" मन के रोगों का अर्जक ,
"धृति" खूसट नेता का साधन
"दया" आत्मश्लाघा का सुख,
"ईमां" आत्मद्रोह का कारण
सत्य एक घायल अपंग पशु,
आधि व्याधि से ग्रसित जर्जरित
"निष्ठां" छल द्रोणाचार्यों का ,
"दान"मूर्खता बलि दानव की
"आत्मा" कल्पित तत्व बुद्धि का ,
जिसके सुख का स्वप्न सजाकर
व्यक्ति सत्य-ईमान-धर्म मिस
आत्मद्रोह का पाप कमाता
संस्कारों की एक विवशता ,
दूजे युग की घृणित व्यवस्था
मत पीसो जग को पाटों में ,
बदलो एक एक परिभाषा


                           .............. किशोर निगम ..२३.०९.१९८२ 

https://www.facebook.com/pages/Satya-Kishore/275039235935734

क्रांतिदूत

क्रांतिदूत


तुम क्रांतिदूत कहते हो अपने को
तो निश्चित ही तुम्हारे कंठ में
विष टिका होगा
आँखों में दहकते अंगारे
हथेलियों पर लपटें
चेहरे पर उगते सूर्य की लालिमा
पदचालन में आंधी और तूफ़ान होंगे

और ह्रदय में
दया का
ममता का सागर होगा
मानव का
मानवता का
आत्मसम्मान का
कुछ तो सम्मान होगा

अन्यथा होगे तुम कूटनीतिज्ञ कोई
पर क्रांतिदूत नहीं
क्रांतिदूत नहीं......................किशोर निगम /२२/११/१९८५ 

                         https://www.facebook.com/pages/Satya-Kishore/275039235935734

बिलखता मौन, उबलता मौन

पिघल पिघल कर चट्टानें भी 



 पिघल पिघल कर चट्टानें भी
आंसू की सरिताएं बनतीं
टूक टूक होते पर्वत
जगती की हर कणिका रोती

आज ह्रदय के स्पंदन के
साथ विश्व स्तब्ध बना है
छिन्न भिन्न हो आज ह्रदय यह
उष्ण रक्त को बहा रहा है
                                            

आग आग बस लगी है
आग आज अंतर में मेरे       
आग यही परिव्याप्त हो रही
जलते धरती , अम्बर तारे
                        किशोर निगम / २४.०४.१९७१

                  https://www.facebook.com/pages/Satya-Kishore/275039235935734?filter=1

रविवार, 19 अगस्त 2012

तुम कहाँ से आ गए हो यहाँ पर ?



कभी ऐसी भी स्थितियां आती हैं  कि मन अपने से ऐसे  अनुत्तरित प्रश्न पूंछने लगता है. कब आती हैं ? शायद तब ,जब जो आदर्श सिखाये जाते हैं , वह सब झूंठे दिखने लगते हैं , या तब जब तमाम  आस्थाएं, झूंठे भ्रम दिखने लगते हैं  :-------

कौन हो तुम ?
तुम कहाँ से आ गए हो यहाँ पर ?            
यहाँ पर, जीवन जहां पर सड़ रहा है
यहाँ पर तीखा धुवाँ धुंधुवा रहा है !
लिजलिजे विषधर यहाँ पर घूमते है
डंक वृश्चिक भी उठाये झूमते है !

टूटता है नीड़ उल्का पात से
घोर रव से चटकती है सब शिलाएं
विष गगन बरसता है
रक्त मुँह से चन्द्रमा भी उगलता है !
सूर्य की छाती जमी हिमपात से
और वृक्षों की शिखाएं जल रही हैं !
पिघलकर उडगन टपकते अंध तम में
घुस रहीं जलती सलाखें पुतलियों में !                 
उड़ रहे पर्वत उठाये पंख अपने           
बाढ़ में सब गाँव , सारे बह गए हैं !                 
पंछियों को भूनता है व्याध निर्मम
रक्त सारी नसों का पानी बना है !

भाग जाओ , भाग जाओ , क्यों खड़े हो ?
कौन हो तुम ? क्यों निरर्थक जल रहे हो ?
तुम कहाँ से आ गए हो यहाँ पर ?
तुम कौन हो ?
            किशोर निगम / २६/१२/१९७४

मैं खुद ही नहीं जानता कि कौन हूँ मैं

                   
  https://www.facebook.com/pages/Satya-Kishore/275039235935734?filter=1

एक ग़ज़ल


मैं खुद ही नहीं जानता कि कौन हूँ मैं
ऐ मेरे मालिक अब तू ही बता दे सबको ।

मैं तो जो भी हूँ , न जानने  की ख्वाहिश है
पर जो पूँछते हैं -क्या जवाब दूँ उनको ?

मेरी तन्हाइयां भी हो गयीं नीलाम यहाँ
सरे-बाजार तूने बेंच दिया है मुझको ।

नज़र की रौशनी जब छीन ली है मेरी तो
मेरे भी रंजो ग़म दिखें भी तो कैसे मुझको ?

मेरा वजूद ही जब मेट दिया है सबने
कब्र में अब भला दफ्न करोगे किसको ?

---------------किशोर निगम 26/05/2012

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

स्नेह की खोज



स्नेह की ही खोज में मैं क्या पता जाता कहाँ हूँ !

एक भिक्षा पात्र लेकर ,और खुद में मस्त हो कर
चल रहा अनजान पथ पर, संभलकर, फिर लड़खड़ाकर


क्या पता मंजिल कहाँ है , मैं तो केवल चल रहा हूँ
स्नेह की ही खोज में मैं क्या पता जाता कहाँ हूँ !

स्नेह मेरा ह्रदय भर कर , मुझे मेरा पथ दिखा कर
कंटकों की पीर हर, पहुँचा सकेगा लक्ष्य पर
सोच कर निकला यही था, और आगे बढ़ रहा हूँ
स्नेह की ही खोज में मैं क्या पता जाता कहाँ हूँ !

अब न मेरा लक्ष्य स्थिर, मात्र मेरा दर्द स्थिर
अब न मुझमें लगन स्थिर , मात्र मेरी प्यास स्थिर
भूल कर हर लक्ष्य ,इन उपलक्ष्य के प्रति बढ़ रहा हूँ
स्नेह की ही खोज में मैं क्या पता जाता कहाँ हूँ !

लोग हँसते देखकर हैं ,लोग भरते आह भी हैं
लोग भिक्षा पात्र में कुछ व्यर्थ कंकण डालते हैं
दया, छलना , वासना , उपदेश --क्या मैं चाहता हूँ
स्नेह की ही खोज में मैं क्या पता जाता कहाँ हूँ !

चाहता हूँ--स्नेह के धोखे मुझे तुम और छल लो
चाहता हूँ -- दर्द, असफलता, निराशा और भर दो
अरे ! जितना है गरल, कम है, मैं ज्यादा चाहता हूँ
स्नेह की ही खोज में मैं क्या पता जाता कहाँ हूँ !

स्वर उठे --"स्नेह ले लो " ",प्यार का विश्वास ले लो"
और मेरे हाथ में फिर निराशा अंगार दे दो
ठोकरें दो, घृणा दे दो , छल भरा अपमान दे दो
मैं सचेतन नहीं, फिर से जडित होना चाहता हूँ
स्नेह की ही खोज में मैं क्या पता जाता कहाँ हूँ !

मैं महासागर हूँ !

मैं महासागर हूँ !


बात-बात में झरते ये आंसू ,
बस इन्हें देखकर ही क्या ,
कहते हो मुझे पोखर ?                                               
पर ये तो ,
मेरे अन्दर अनवरत खेलती
मस्त लहरों की अठखेलियाँ हैं
जो तुम्हें ऊपर से नीचे तक
भिगो जाती हैं .
सुनो मेरी उछलती लहरों का शोर
मैं छिछला पोखर नहीं ,
वास्तव में , महासागर हूँ . ।

पूरे चाँद के दिन
मेरे ज्वार-भाटे का भयानक शोर
क्या तुम नहीं सुनते ?
क्या मेरे अन्दर के खारेपन का परीक्षण ,
तुम नहीं कर पाते ?
क्या नहीं सुनी
मेरी बाड़वज्वाला में नष्ट हो गए ,
विशालकाय जहाजों की
अगणित कहानियां ?

मुझमें तैरना सरल है --- इस भ्रम में
आगे मत बढना .
लहरें अनंत में खींच ले जायेंगी ।

मेरे तटों पर पड़े ये मोती देखो
क्या नहीं बताते ये कहानी
उन खजानों की ,
गर्भ में अपने जो , मैंने छिपा रखे हैं ?
डूबो और पाओ ।

क्या नहीं सुनी मेरे अन्दर तैरती ,
उन विशाल मछलियों की कथाएं
खा जाती हैं जो क्षण में नाविकों को ?
ये वही जीव हैं ,
जिनके आंसू कोई देखता नहीं ।

नहीं , तुम्हारे कह देने भर से ,
मैं पोखर नहीं हो सकता
नहीं है यह कोई गर्वोक्ति . यही सत्य है --
मैं महासागर हूँ , महासागर रहूँगा ।

.............किशोर निगम /२३-०९-१९८२

मैं एक अशांत महासागर !

                                                                                    https://www.facebook.com/kishore.nigam1

मैं एक अशांत महासागर !



मैं एक अनंत अशांत महासागर
तुम्हें अपने तट पर खेलता देख ,
शांत होकर,
तुम्हारे नन्हे पैरों को
हौले हौले पखारने लगा ।
पर ,अगले ही क्षण सुनाई पड़ी
तुम्हारी माँ की , तुम्हे पुकारती,
तेज डांट भरी , कर्कश आवाज

और देखा तुम्हें,
लहरों के भय से , तेज भागते हुए ।
मैं स्तब्ध रह गया
और तेजी से, लहरों को  समेटने  लगा                                                           
                                                                           
कुछ वर्ष बाद ,
तुम बड़े होकर ,
टूटी नाव पर बैठ ,
मेरे अन्दर की बड़वाग्नि के
पास आने लगे ।
मैंने कुछ तेज लहरें उठाकर
तुम्हें डांटा ,
पर तुम नहीं माने ,
बढ़ते गए , बढ़ते गए ।
विवश हो,अपनी
अंतर्ज्वाल समेट कर मैंने
जंगलों में फ़ेंक दी ।
( जो दावानल बन गयी )

फिर एक दिन , अपने तट पर ,
तुम्हारे पैरों पर,
फेंकी थी मैंने एक सीप,
लहरों से उछालकर ,
जिसमें छिपा था ,
दुनिया का सबसे सुन्दर मोती ।
आवाज दी थी मैंने ,
पूरी ताकत और पूरे स्नेह से तुम्हे --
" आओ ,
मेरे अन्दर छिपे असंख्य मोतियों को ,
दुनिया भर में बिखेर दो
सजा दो दुनिया को इनसे ।
मेरे तट पर खेलते हुए ,
अब तैरना सीख गए हो ।
मैं तुम्हे कभी डूबने नहीं दूंगा ।"
परन्तु तुम्हें समझाया,
तुम्हारे पिता ने
" कदापि नहीं ,
वहां भयानक शार्कों के सिवा कुछ नहीं . "
डरकर तब तुमने ,
फ़ेंक दिया उस सीप को ,
वापस , मेरी उछलती लहरों के बीच ।
क्रोधित हो मैंने लहरों की झंझा से
टुकड़े- टुकड़े कर डाले ,अपने सब मोती ,
निर्मित किया था जिन्हें, युगों की साधना से ।

फिर देखा, पूर्णमासी को ,
पूर्ण चन्द्र बने तुम ,
हँस रहे थे ।
मैंने उछल मारी ,
तुम्हे गोद लेने को ।
पर तुम थे बहुत दूर,                                                           
नहीं मिले , नहीं मिले .
हाँ , दो अनोखे , मोती के टुकड़े,
उछलकर, तट से , बहुत दूर जा गिरे पता नहीं , तुम्हारे छोटे हाथ
इन मोती के टुकड़ों को
किस हवस के मारे , ढोंगी
पूंजीपति को सौपेंगे !
और पायेंगे बदले में
झूंठ का खंजर !                                            

मैं प्रतीक्षा में हूँ उस दिन की ,                    
जब तुम्हारे लोग जहाज पर चढ़कर ,
मुझमें तैरती ,मधुरिम भावों की
अनोखी मछलियाँ पकड़ने आयेंगे
और मैं अपनी मस्त क्रूर लहरों से
उन विशाल जहाज़ों को
नष्ट-भ्रष्ट कर दूंगा ,
टूक- टूक कर दूंगा ।
...........किशोर निगम २३/ ०९/१९८२

नजर और नजरिया

                                 https://www.facebook.com/kishore.nigam1


नजर  को  क्या  है  , भटकती  रहती  है  , काम  है  उसका
नजरिये  ही  कदम  आगे  बढाते , रोकते  , पीछे  हटाते  हैं ।
कदम  बढ़  पाए  न  आगे ,नजरिये को दिखा खतरा ,
"नजरिया  तंग  है  "  बड़ी  भोली  नजर  की  यह  शिकायत  है

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

रेगिस्तान

रेगिस्तान

तुम किसी को "अपना" मत कहो ।
मत कहो, मत कहो ।
तुम्हारी इस बात को सुनकर,
जंगलों में आग लग जाती है ।
नदियाँ सूख जाती हैं ।
पहाड़ों की छाती फट जाती है ।
वही पहाड़, ,
जिनकी कोख से निकला मैं हिमनद
तुम्हारी यह "अपना - अपना " की पुकार सुन ,
सागर तुम्हे समझ ,
गोद में तुम्हारी,
कूद पडा था ,
किलकते बालक सा ।
पर तुम,
तुम तो अपार रेगिस्तान थे ,
सोख गए मुझे ,
पूरा का पूरा ।
                                                                                        https://www.facebook.com/kishore.nigam1

पराग

 https://www.facebook.com/kishore.nigam1

पराग

मैं तो मात्र एक जंगली फूल हूँ ।
भटकता फिर रहा हूँ
आँधियों की दया पर ,
इसलिए की तुम्हें ढूंढकर
समर्पित कर दूं अपना पराग ।
नष्ट होने से पूर्व ,
दे दूँ अपने को और तुमको,
एक नया जीवन ।
सदियों, सहस्राब्दियों से ,
इसी खिलने , मुरझाने के
अनवरत क्रम से प्राप्त ,
सारे ज्ञान और अनुभव को ,
आरोपित कर दूँ ,
उस नए जीवन में,
पाने के लिए,
नया ज्ञान और नई सुगंधी ।
पर तुमने तो छिपा रखा है,
किसी कोठी के,
किसी छोटे से गुलदस्ते में
अपने आप को
जहां मेरी पहुँच नहीं
और तुम्हारा विकास नहीं
ह्रास है,
बस ह्रास है ।

धरती के गोले





                                           https://www.facebook.com/kishore.nigam1

अकृतज्ञता पूर्ण अन्याय, अत्याचार के विरुद्ध -----
(कोई सन्दर्भ नहीं , कृपया अपना अपना सन्दर्भ गृहण करें )


धरती के गोले ,

हम न अभी ठन्डे हो पाए , धरती के जलते गोले हैं
अनधिकार बस्ती न बसाओ ,ज्वालामुखी भड़क सकते हैं


मोह और सांसारिकता की राख , भूमि की परत है निर्बल
जिजीविषा और स्वाभिमान की आग अभी भी प्रबल बनी है
छल और घात भरा पंकिल जल मत बरसाओ तुम ऊपर से
आग प्रलय की जल से मिली तो ज्वालामुखी भड़क सकते हैं

जीवन को पनपाया हमने , जीवन को सुविधाएं दी हैं
जीवन को बहते जाने की , नित ही नयी दुआएं दी हैं
वह जीवन ही झूंठे मद में जीवन स्रोत अगर खन डाले
तो फिर हक़ है हमें की हम मर्यादा की रक्षा करने को,
अपनी मर्यादा भी छोड़ें, उत्पाती हाथों को तोड़ें

रे उपद्रवी बालक !नागों को छेड़ा तो डंस सकते हैं
अनधिकार बस्ती न बसाओ, ज्वालामुखी धधक सकते है
..................सत्य (कविता नहीं , विचार) २३.११.1985

हा ! हन्त ! हन्त ! नलिनीं गज उज्जहार ।।"


 "रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं ,भानुरुदेश्यति हसिष्यति कमल श्री : ।
इत्थं विचारयति कोषगते द्विरेफे . हा ! हन्त ! हन्त ! नलिनीं गज उज्जहार ।।"







                                                                                  https://www.facebook.com/kishore.nigam1
सोच रहा था कमल कोष में बंद भ्रमर यह
बीतेगी यह रात्रि सुबह फिर होगी प्यारी
निकलेगा फिर भानु
,कमल खिल जाएगा यह
मुझे मिलेगी फिर मेरी आजादी प्यारी
किन्तु हाय दुर्भाग्य सुबह होने के पहले
मस्त एक गज उसी ताल के तट पर पहुंचा
कमल नाल को तोड़ उसे उदरस्थ कर गया
कर्महीन भौरे पर रोती सुबह बिचारी |

                .............Kishore Nigam / 26/05/12

मौन के विस्तार को अब तोडना क्यों चाहते हो ?

                                        https://www.facebook.com/kishore.nigam1

मौन के विस्तार को अब तोडना क्यों चाहते हो ?

गल चुके हैं अंग , धूमिल नेत्र , मस्तक पक चुका

दन्त-क्षय ने स्वर बिगाड़ा , ओज का यौवन हरा
काँपता स्वर भरभराता,समझ आने में कठिन
कांपती है देह , भावों में न अब कुछ रस बचा
उपहास का, परिहास का क्यों पात्र गढ़ना चाहते हो ?
मौन के विस्तार को अब तोडना क्यों चाहते हो ?

कहाँ वह वाणी, लगा करती थी, जो लोकोत्तर ?

कहाँ वह वाणी, जिसे सुन उठा करता मन सिहर ?
कहाँ वह वाणी, कहाँ जीवित बचे वे भाव अब ?
अलौकिक संसार के दिखला सकें जो चित्र नव ?
मात्र थोथे शब्द अस्फुट क्यों बिखेरा चाहते हो ?
मौन के विस्तार को अब तोडना क्यों चाहते हो ?

था सक्रिय मुझमें विधाता, किन्तु क्या रचता रहा !

जीव अक्षम, अप्रयोगिक ,ध्वंश बस गढ़ता रहा !
माँगते हैं अर्धनिर्मित अंश अपनी पूर्णता को ...
क्षोभ उनका, दुःख उनका , क्या कभी भी नप सका ?
मत पढो , मत सुनो मुझको , क्यों बिखरना चाहते हो ?
मौन के विस्तार को अब तोडना क्यों चाहते हो ?

----------------किशोर निगम / १३/ ०१/ २००4

तुम कौन हो ?

  हुआ था जब बिग बैंग

------(१९७३ के मेरे एक अपूर्ण गीत का अद्यतन रूपांतरण )

https://www.facebook.com/kishore.nigam1





  हुआ था जब बिग बैंग
और जन्मी थी यह सृष्टि
बताते हैं वैज्ञानिक .....
पता नहीं कितने अरबों वर्ष बाद
तब हुआ था जीवन का जन्म
मुझे भी कहाँ याद .?
जब भी हुआ था, तब ही सही ,
किन्तु जीवन के साथ ही तो
जन्मा था मैं भी।
मैं , जो देह नहीं , आत्मा हूँ .
किन्तु इतना है याद मुझे ,
की मेरे जन्म के साथ ही ,
शुरू हो गयी थी मेरी तलाश
तुम्हें खोजने की ।
तुम जो इस आत्मा के मस्तिष्क में छाये थे
दिखा रहे थे अपनी मन मोहक छवि
सुना रहे थे अपना मोहक संगीत ,
भर रहे थे मेरी आत्मा में अपनी सुगंधि ,
तुम्हारे स्पर्श की कल्पना करती थी
मेरे रोम-रोम को रोमांचित ,
तुम्हारी चेहरे का रंग ,
जैसे इन्द्रधनुष के सात रंग
हजारों अन्य रंगों में विभक्त हो गए हों ..
मैंने पूंछा था चीख-चीख कर ---
"क्या तुम ईश्वर हो ? "
बदले में तुम्हारे संगीतमय स्वर में
लौटा था मेरा ही प्रश्न --
"क्या तुम ईश्वर हो ?"
मैंने पूंछा था तब --"आखिर तुम कौन हो ?"
उत्तर मिला था , जैसे देवता गा रहे हों --
" मैं हूँ अपूर्ण , किन्तु तुम्हारी पूर्णता
और जान लो यह भी, तुम हो मेरी पूर्णता "
"कहाँ खोजूं तुम्हें ?" पूंछा था मैंने ---
उत्तर मिला नहीं, छाया अदृश्य हुयी .
खोज रहा हूँ बस तभी से तुमको ,
कितने जन्म, पुनर्जन्म ,
कितनी तड़प , बेचैनी,
कितनी ज्वाला, विषमय हाला ,
कितनी प्यास , तड़पती आश
कितने त्राश, जग के पाश ,
कितनी मरीचिका , कितनी विभीषिका
कितनी घृणा , कितने अपमान
सहे हैं इस आत्मा ने , तुम्हारी खोज में ,
पर क्या कभी मिले तुम ?
नहीं है तुम्हारा अस्तित्व कहीं भी .
हो तुम मात्र एक प्रेत-छाया .
कहती है मेरी हताशा , निराशा
मगर फिर क्यों , भला क्यों
आती हर क्षण आहट तुम्हारी ?
गूंजती कानों में हंसी तुम्हारी ?
गंध, भरती है नथुनों में मेरे ?
रोमांच होता है, जैसे तुमने अभी छुआ मुझे ?
तारक दलों के बीच हंसते से दिखते हो ?
बादलों की खिडकियों से इशारे करते हो ?
किन्तु दृष्टि उठते ही मेरी ,
कहाँ , कहाँ , कहाँ अदृश्य हो जाते हो ?
तुम कौन हो ?

ऐ मयूरी ! नाच दे अब ,

 https://www.facebook.com/kishore.nigam1

ऐ मयूरी ! नाच दे अब ,
कर रहा यह मेघ कब से छाँव तुझ पर !

क्यों अचल से दृग तुम्हारे , आज स्थिर हो रहे हैं ?
क्यों सजल सी नयन कोरें , उठ रहीं , फिर गिर रही हैं ?
आज साहस साथ लेकर सामने पहुंचा तुम्हारे
आज तो देवांगना इस और अपनी दृष्टि कर दो
कामिनी ! कर प्रलय तू अब !
प्रणय का अनुरक्त मिटने आ गया है आज तुझ पर !
ऐ मयूरी ! 00000000000

पंख फैला नाचने को, पर कहीं तू उड़ न जाना
तरल ज्वाला बिन बुझाये, गगन का मत छोर बनाना
जोड़ दो मन -गाँठ, अब !
नैन बनकर प्रीति-डोरी , बांधते मुझको तुझी पर !
ऐ मयूरी ! 000000000

तेरी अलकों से मलय- सौरभ मचलता आ रहा है (+)
तेरे अधरों पर कुसुम रक्ताभ खिल ,हिल-डुल रहे हैं
तेरे नयनों में गुलाबी स्वप्न विचरण कर रहे हैं
सहज स्वीकृति बोध दे दे !
नव- सृजन का नव -निमंत्रण,ईश का निर्देश तुझ पर
ऐ मयूरी ! 000000000

रात्रि की अमराइयों में कूक तेरी रोज उठती
मधुर मद्धिम प्रीति की अगणित तरंगें है उमड़तीं
मुस्कुरा दे आज पल भर !
जा रहा यह पथिक देकर , प्यार का सब भार तुझ पर
ऐ मयूरी ! 000000000

इस तरह क्यों विवश -मुक्ते ! झुक रहे हैं दृग तुम्हारे ?
हास्यमय रोदन लिए क्यों , मुख-परिधि बनती तुम्हारी ?
शांति से संताप सह अब !
विश्व-दुःख-घन ,आज क्षण भर , घिर पड़ेगा प्रिये तुझ पर !
ऐ मयूरी ! 000000000

आज क्षण विलगाव का है , मिलन की अब "इतिश्री" है
आज तो हंस कर , सहज मन , आत्मा का मिलन कर दो !
मद-हलाहल -अमृत दे दे !
युग-तृषित की तृप्ति का हर भार तुझ पर !
ऐ मयूरी ! 000000000
----- Kishore Nigam 04-11-1974
Note - (+) added 24/05/2012


-भूख -

------------भूख -----------


मैंने देखी है वह भूख
जिसमें नागिन खा जाती अपने अण्डों को,
बाघिन खा जाती है अपने बच्चों को ।
मैंने देखी है भूख
जो खा जाती है--
नैतिकता को , धर्म को , आदर्शों को , सिद्धांतों को ।
मत दो उलाहने इन सब के खो जाने का ।
बचाना है इन्हें हमारे पास

तो शांत करो पहले भूख ।
भूख जो अभिशाप है हमारी
और हवस है तुम्हारी ।
आस्था के अंधेरों में मत भटकाव हमें ।
रहकर देखो भूखे कुछ दिन
और देखो तुम्हारे भोजन को
गिद्धों के द्वारा लुटते हुए ।
फिर करना धर्म , आस्था और आदर्शों की
बड़ी बड़ी बातें ।
पर तुम्हें यह देखने का मौका
वह ऊपर वाला देगा कब ?
"जर - खरीद गुलाम" जो ठहरा
तुम्हारे "पिछले जन्मों" के
"पुण्यों " का ।
................Kishore Nigam /19/07/2012
 
                                                                                https://www.facebook.com/kishore.nigam1

आहटें

ये खारा पानी है

तू मेरे अन्दर है, हर क्षण संवाद है.



तू मेरे अन्दर है
हर क्षण संवाद है.
लडखडाना , संभलना,
जीवन की और
गति की पहचान है.
शब्द सहारा हैं
किन्तु अंतिम नहीं ,
तू है सहारा ,
जो मेरे अन्दर है .
अवसाद ,
अवसरों की चूक का ,
या किसी का भी ,
स्वाभाविक है पर निरर्थक है.
चूक का प्रतिकार
केवल आगे की सतर्कता है.
कौन कहता है कि तू अब नहीं है ?                
तू है मेरे अन्दर .
हर क्षण संवाद है.

.............. Kishore Nigam
10/07/2012                                                         https://www.facebook.com/kishore.nigam1

सच की आग न छिपती








ख्वाब शीशे के होते हैं,

बरसात की ये चार बूंदें ,

कहाँ है स्वतंत्रता ?



कहाँ है स्वतंत्रता ?

कहाँ है स्वतंत्रता ?

हम पंछी हैं ,
स्वतंत्र और उन्मुक्त ।
पंछी भी कैसे !
जो मुक्त गगन में उड़ते ,
उन्मुक्त उड़ते , स्वतंत्र हो विचरते ।

पर यह स्वतंत्रता कैसी ?

बहेलियों के डर से धरती पर आते नहीं ,
बाजों के झुण्ड में फंसे , फडफडाते हैं ,
उनके ही भय  से हम झुण्ड में रहते हैं ,
अपने ही शक्तिशाली बन्धुवों की सहते मार
मार नहीं सहते, तो मार दिए जाते हैं ।

व्याप्त जहरीला धुवां गगन में परितः
धुवें के कारण आकाश में रह सकते  नहीं ,
फिर भी हम मुक्त हैं गगन में रहने को ।

व्याधों का झुण्ड धरती पर है सर्वतः ,
हर क्षण, नीचे है मौत की सम्भावना ,
फिर भी हम मुक्त हैं धरती पर आने को ।

घोंसलों में गंध, दुर्गन्ध , कठिनाइयां ही ,
फिर भी हम मुक्त हैं , घोंसलों में रहने को ।

घोंसले  भी वर्षा में टूट गए , साधन नहीं ,
पर हम तो मुक्त हैं घोंसले बनाने को ।

जिन्दा रहने को कोई भी उपाय नहीं
कोई भी उपाय नहीं, कोई भी उपाय नहीं
फिर भी हम मुक्त हैं जिन्दा रहने को ।

कैसी यह स्वतंत्रता ? किस आज़ादी यह ?
सब और बेबसी, घुटन , निरीहता
जीना कौन चाहता है जिंदगी ऐसी पर
मरने के लिए भी है तो, पर कहाँ है ?
कहाँ है ? कहाँ है ? कहाँ है स्वतंत्रता ?
.............किशोर निगम / ०७/०८/१९७१

बुधवार, 15 अगस्त 2012

चाह !

चाह !


मैंने क्या चाहा था तुमसे ?
बस विश्वास के उस अनंत सागर की एक बूँद
जिसे ,(अपनी कल्पना में )
तुम्हारे अन्दर लहराता देखा था मैंने
और इस चाह का
क्या-क्या मूल्य नहीं दिया था मैंने ?
फिर भी तुम मुकर गए
क्यों ?

शायद इस लिए कि
वह पूरा सागर बेंच चुके थे तुम
केवल अपशिष्ट-विसर्जन की भांति,
सहज-क्रिया-स्वरुप बह निकले
आँसुवों के परनाले को ।
या फिर कोढ़ी-भिखारी के उन दो हाथों को
जिन पर कोहिनूर हीरे से
टपक पड़े थे तुम
और बजाय तुम्हें तराशकर चमकाने के ,
उन दो हाथों ने
गाड़ दिया था तुम्हें
जमीन के अन्दर
कम्पोस्ट खाद बनने को . ।
या, शायद इसलिए कि
मेरा दिया हुआ मूल्य
बहुत कम लगा था तुम्हे ।
पर तुम भूल गए कि
उस सागर को पाने का
मेरा और केवल मेरा , पूरा अधिकार था .
क्योंकि , मैं ही था जो तुम्हारे अंतर की
अनंत गहराइयों में डुबकी लगा
तुम्हारे अन्दर छिपे उस खजाने का ,
पता लगा लाया था ,
और तुम्हारी एक सीप में,
छिपा मोती दिखाकर
बताना चाहता था इसका पता
सारे जग को ।
जिसको सारे जग में लुटाने की तमन्ना
तुम्हारी पहली और अंतिम तमन्ना थी ।
तुम भूल गए कि उस अधिकार के लिए
मेरा कोई मूल्य देना भी
आवश्यक नहीं था ,
क्योंकि पूरे से ज्यादा मूल्य
मैं पहले ही दे चुका था ।
.............KN/23/09/75

रविवार, 10 जून 2012

मैं और तुम

https://www.facebook.com/kishore.nigam1
शून्य से उपजा था जिस क्षण,
शून्य से उपजा था जिस क्षण,
तुम्हारा वह गरिमामय तन
तुम्हारा सहयोगी का रूप
... तुम्हारा सह्भोगी का रूप
तुम्हारी पायल की रुनझुन
तुम्हारे अभय पदों की धुन
तुम्हारी निश्छल मोहक हंसी
तुम्हारी चितवन अर्थपगी
मनुज को ले जाती उस ओर
आदि और अंत जहां एक ठौर
जीव और ब्रह्म जहां पर एक
समष्टि व्यष्टि जहां अभेद
काल और दिक् का बीज बने
सर्व आयाम हमीं में घने
अर्धनारीश्वर मैं और तुम
तुम्ही मैं बने, और मैं तुम
वायु के सघन कणों से हम
कर्म और ज्ञान व इक्षा शम

तभी कुछ हुआ व्यतिक्रम एक
एक से बने द्वैत सविवेक
उनीदित सी आँखें खोले
भ्रमों का कीटजाल ओढ़े
देखते कुछ दिखाते कुछ
चाहते कुछ तो करते कुछ
प्रकृति ने दिए हमें अभिशाप
जीव ने भोगे जो अभिशाप
ब्रह्म ने भरमाया दिन रात
जगत ने पत्थर मारे घात
विकल बेकल विह्वल क्षोभित
यज्ञ में जले सर्प पीड़ित
रेंगते हैं जीवन के लिए
जिन्दगी खड़ी दंड है लिए
मृत्यु उपहास उडाती है
प्रकृति धर धर ठुकराती है

सोचता हूँ मैं अब इस क्षण
कौन था मैं कौन थे तुम
नहीं तुम तो कोई परिचित
सिर्फ तुम पिंडों से निर्मित
तुम्हारा वह आकर्षक रूप
तुम्हारा अकथ अलौकिक रूप
मात्र मेरी ही कल्पना थी
मात्र मेरी ही जल्पना थी
पिंड में देखी जो आत्मा
मात्र मेरी ही अल्पना थी

                                     Kishore Nigam /26/12/1974

"मन के है धारे दो ,

https://www.facebook.com/kishore.nigam1

मन के है धारे दो , 

मन के है धारे दो                                                          
एक अपना आप,
एक प्राप्ति की अभीप्सा
मेल नहीं खाते
अपना आप और अपनी अभीप्सा
उसका अपना आप , अपनी चाहत
मेरा अपना आप आप , अपनी चाहत
मेल नहीं खाते
मेरे और उसके अपने अपने आप
चाहतें भले ही खा जाती हैं कभी मेल
कभी हम चाहतों को चुनते हैं
और कर लेते हैं अपने आप को बदरंग
कभी हम अपने आपे को चुनते हैं
और कर लेते हैं अपनी चाहतों को बदरंग
ईश्वर  ने बनायीं ही प्रकृति है ऐसी
 
कि  जहां मिलती है पनाह ,
दर्द भी वहीँ मिलता है
साझा रिश्ता है जैसे इन दोनों का
"


                                                 Kishore Nigam /25/04/2012