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मैं एक अशांत महासागर !
मैं एक अनंत अशांत महासागर
तुम्हें अपने तट पर खेलता देख ,
शांत होकर,
तुम्हारे नन्हे पैरों को
हौले हौले पखारने लगा ।
पर ,अगले ही क्षण सुनाई पड़ी
तुम्हारी माँ की , तुम्हे पुकारती,
तेज डांट भरी , कर्कश आवाज
और देखा तुम्हें,
लहरों के भय से , तेज भागते हुए ।
मैं स्तब्ध रह गया
और तेजी से, लहरों को समेटने लगा
लहरों के भय से , तेज भागते हुए ।
मैं स्तब्ध रह गया
और तेजी से, लहरों को समेटने लगा
कुछ वर्ष बाद ,
तुम बड़े होकर ,
टूटी नाव पर बैठ ,
मेरे अन्दर की बड़वाग्नि के
पास आने लगे ।
मैंने कुछ तेज लहरें उठाकर
तुम्हें डांटा ,
पर तुम नहीं माने ,
बढ़ते गए , बढ़ते गए ।
विवश हो,अपनी
अंतर्ज्वाल समेट कर मैंने
जंगलों में फ़ेंक दी ।
( जो दावानल बन गयी )
फिर एक दिन , अपने तट पर ,
तुम्हारे पैरों पर,
फेंकी थी मैंने एक सीप,
लहरों से उछालकर ,
जिसमें छिपा था ,
दुनिया का सबसे सुन्दर मोती ।
आवाज दी थी मैंने ,
पूरी ताकत और पूरे स्नेह से तुम्हे --
" आओ ,
मेरे अन्दर छिपे असंख्य मोतियों को ,
दुनिया भर में बिखेर दो
सजा दो दुनिया को इनसे ।
मेरे तट पर खेलते हुए ,
अब तैरना सीख गए हो ।
मैं तुम्हे कभी डूबने नहीं दूंगा ।"
परन्तु तुम्हें समझाया,
तुम्हारे पिता ने
" कदापि नहीं ,
वहां भयानक शार्कों के सिवा कुछ नहीं . "
डरकर तब तुमने ,
फ़ेंक दिया उस सीप को ,
वापस , मेरी उछलती लहरों के बीच ।
क्रोधित हो मैंने लहरों की झंझा से
टुकड़े- टुकड़े कर डाले ,अपने सब मोती ,
निर्मित किया था जिन्हें, युगों की साधना से ।
फिर देखा, पूर्णमासी को ,
पूर्ण चन्द्र बने तुम ,
हँस रहे थे ।
मैंने उछल मारी ,
तुम्हे गोद लेने को ।
पर तुम थे बहुत दूर,
नहीं मिले , नहीं मिले .
हाँ , दो अनोखे , मोती के टुकड़े,
उछलकर, तट से , बहुत दूर जा गिरे पता नहीं , तुम्हारे छोटे हाथ
इन मोती के टुकड़ों को
किस हवस के मारे , ढोंगी
पूंजीपति को सौपेंगे !
और पायेंगे बदले में
झूंठ का खंजर !
मैं प्रतीक्षा में हूँ उस दिन की ,
जब तुम्हारे लोग जहाज पर चढ़कर ,
मुझमें तैरती ,मधुरिम भावों की
अनोखी मछलियाँ पकड़ने आयेंगे
और मैं अपनी मस्त क्रूर लहरों से
उन विशाल जहाज़ों को
नष्ट-भ्रष्ट कर दूंगा ,
टूक- टूक कर दूंगा ।
...........किशोर निगम २३/ ०९/१९८२
तुम बड़े होकर ,
टूटी नाव पर बैठ ,
मेरे अन्दर की बड़वाग्नि के
पास आने लगे ।
मैंने कुछ तेज लहरें उठाकर
तुम्हें डांटा ,
पर तुम नहीं माने ,
बढ़ते गए , बढ़ते गए ।
विवश हो,अपनी
अंतर्ज्वाल समेट कर मैंने
जंगलों में फ़ेंक दी ।
( जो दावानल बन गयी )
फिर एक दिन , अपने तट पर ,
तुम्हारे पैरों पर,
फेंकी थी मैंने एक सीप,
लहरों से उछालकर ,
जिसमें छिपा था ,
दुनिया का सबसे सुन्दर मोती ।
आवाज दी थी मैंने ,
पूरी ताकत और पूरे स्नेह से तुम्हे --
" आओ ,
मेरे अन्दर छिपे असंख्य मोतियों को ,
दुनिया भर में बिखेर दो
सजा दो दुनिया को इनसे ।
मेरे तट पर खेलते हुए ,
अब तैरना सीख गए हो ।
मैं तुम्हे कभी डूबने नहीं दूंगा ।"
परन्तु तुम्हें समझाया,
तुम्हारे पिता ने
" कदापि नहीं ,
वहां भयानक शार्कों के सिवा कुछ नहीं . "
डरकर तब तुमने ,
फ़ेंक दिया उस सीप को ,
वापस , मेरी उछलती लहरों के बीच ।
क्रोधित हो मैंने लहरों की झंझा से
टुकड़े- टुकड़े कर डाले ,अपने सब मोती ,
निर्मित किया था जिन्हें, युगों की साधना से ।
फिर देखा, पूर्णमासी को ,
पूर्ण चन्द्र बने तुम ,
हँस रहे थे ।
मैंने उछल मारी ,
तुम्हे गोद लेने को ।
पर तुम थे बहुत दूर,

नहीं मिले , नहीं मिले .
हाँ , दो अनोखे , मोती के टुकड़े,
उछलकर, तट से , बहुत दूर जा गिरे पता नहीं , तुम्हारे छोटे हाथ
इन मोती के टुकड़ों को
किस हवस के मारे , ढोंगी
पूंजीपति को सौपेंगे !
और पायेंगे बदले में
झूंठ का खंजर !
मैं प्रतीक्षा में हूँ उस दिन की ,
जब तुम्हारे लोग जहाज पर चढ़कर ,
मुझमें तैरती ,मधुरिम भावों की
अनोखी मछलियाँ पकड़ने आयेंगे
और मैं अपनी मस्त क्रूर लहरों से
उन विशाल जहाज़ों को
नष्ट-भ्रष्ट कर दूंगा ,
टूक- टूक कर दूंगा ।
...........किशोर निगम २३/ ०९/१९८२

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