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रविवार, 19 अगस्त 2012

मैं खुद ही नहीं जानता कि कौन हूँ मैं

                   
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एक ग़ज़ल


मैं खुद ही नहीं जानता कि कौन हूँ मैं
ऐ मेरे मालिक अब तू ही बता दे सबको ।

मैं तो जो भी हूँ , न जानने  की ख्वाहिश है
पर जो पूँछते हैं -क्या जवाब दूँ उनको ?

मेरी तन्हाइयां भी हो गयीं नीलाम यहाँ
सरे-बाजार तूने बेंच दिया है मुझको ।

नज़र की रौशनी जब छीन ली है मेरी तो
मेरे भी रंजो ग़म दिखें भी तो कैसे मुझको ?

मेरा वजूद ही जब मेट दिया है सबने
कब्र में अब भला दफ्न करोगे किसको ?

---------------किशोर निगम 26/05/2012

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