अग्निवीणा
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गुरुवार, 16 अगस्त 2012
सच की आग न छिपती
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लाख सितारें साजिस रच लें , लाख उमड़ लें बादल
सहमे सूरज, नैतिकता की नाव भले हो घायल
नहीं रहेगी रात सदा , न जीवन धारा रुकती ,
झूंठे नारों, के कोहरे में सच की आग न छिपती
Kishore Nigam / 14/07/2012
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