पृष्ठ

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

हा ! हन्त ! हन्त ! नलिनीं गज उज्जहार ।।"


 "रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं ,भानुरुदेश्यति हसिष्यति कमल श्री : ।
इत्थं विचारयति कोषगते द्विरेफे . हा ! हन्त ! हन्त ! नलिनीं गज उज्जहार ।।"







                                                                                  https://www.facebook.com/kishore.nigam1
सोच रहा था कमल कोष में बंद भ्रमर यह
बीतेगी यह रात्रि सुबह फिर होगी प्यारी
निकलेगा फिर भानु
,कमल खिल जाएगा यह
मुझे मिलेगी फिर मेरी आजादी प्यारी
किन्तु हाय दुर्भाग्य सुबह होने के पहले
मस्त एक गज उसी ताल के तट पर पहुंचा
कमल नाल को तोड़ उसे उदरस्थ कर गया
कर्महीन भौरे पर रोती सुबह बिचारी |

                .............Kishore Nigam / 26/05/12

6 टिप्‍पणियां: