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सोमवार, 20 अगस्त 2012

बिलखता मौन, उबलता मौन

पिघल पिघल कर चट्टानें भी 



 पिघल पिघल कर चट्टानें भी
आंसू की सरिताएं बनतीं
टूक टूक होते पर्वत
जगती की हर कणिका रोती

आज ह्रदय के स्पंदन के
साथ विश्व स्तब्ध बना है
छिन्न भिन्न हो आज ह्रदय यह
उष्ण रक्त को बहा रहा है
                                            

आग आग बस लगी है
आग आज अंतर में मेरे       
आग यही परिव्याप्त हो रही
जलते धरती , अम्बर तारे
                        किशोर निगम / २४.०४.१९७१

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