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गुरुवार, 16 अगस्त 2012

धरती के गोले





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अकृतज्ञता पूर्ण अन्याय, अत्याचार के विरुद्ध -----
(कोई सन्दर्भ नहीं , कृपया अपना अपना सन्दर्भ गृहण करें )


धरती के गोले ,

हम न अभी ठन्डे हो पाए , धरती के जलते गोले हैं
अनधिकार बस्ती न बसाओ ,ज्वालामुखी भड़क सकते हैं


मोह और सांसारिकता की राख , भूमि की परत है निर्बल
जिजीविषा और स्वाभिमान की आग अभी भी प्रबल बनी है
छल और घात भरा पंकिल जल मत बरसाओ तुम ऊपर से
आग प्रलय की जल से मिली तो ज्वालामुखी भड़क सकते हैं

जीवन को पनपाया हमने , जीवन को सुविधाएं दी हैं
जीवन को बहते जाने की , नित ही नयी दुआएं दी हैं
वह जीवन ही झूंठे मद में जीवन स्रोत अगर खन डाले
तो फिर हक़ है हमें की हम मर्यादा की रक्षा करने को,
अपनी मर्यादा भी छोड़ें, उत्पाती हाथों को तोड़ें

रे उपद्रवी बालक !नागों को छेड़ा तो डंस सकते हैं
अनधिकार बस्ती न बसाओ, ज्वालामुखी धधक सकते है
..................सत्य (कविता नहीं , विचार) २३.११.1985

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