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सोमवार, 20 अगस्त 2012

चाहिए अन्धकार, प्रकाश नहीं मुझको

नितांत व्यक्तिगत (शायद किसी और का भी हो, उसके लिए)


चाहिए अन्धकार, प्रकाश नहीं मुझको


यह जलता प्रकाश
यह उच्श्रंखल प्रकाश
जलता है
जलाता है
मुझको और सबको
पड़कर इन चक्षुवों पर

घायल इन्हें करता
बेकार कर देता है

बुझा दो , बुझा दो इन जलते हुए दीपों को
हठीले दीपों को , जोशीले दीपों को
शान्ति की जरुरत है, नीरव की जरुरत
बेहतर है अन्धकार ही बना रहने दो

अन्धकार स्वयं में ही कोमल है, शांत है
किन्तु यह प्रकाश, इससे मन उद्भ्रांत है
भटकन नहीं, तड़पन नहीं, कोलाहल भी नहीं
चाहिए अन्धकार, प्रकाश नहीं मुझको
                                           किशोर निगम .... ०६.०८.१९७२ 


                        https://www.facebook.com/pages/Satya-Kishore/275039235935734

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