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गुरुवार, 16 अगस्त 2012

पराग

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पराग

मैं तो मात्र एक जंगली फूल हूँ ।
भटकता फिर रहा हूँ
आँधियों की दया पर ,
इसलिए की तुम्हें ढूंढकर
समर्पित कर दूं अपना पराग ।
नष्ट होने से पूर्व ,
दे दूँ अपने को और तुमको,
एक नया जीवन ।
सदियों, सहस्राब्दियों से ,
इसी खिलने , मुरझाने के
अनवरत क्रम से प्राप्त ,
सारे ज्ञान और अनुभव को ,
आरोपित कर दूँ ,
उस नए जीवन में,
पाने के लिए,
नया ज्ञान और नई सुगंधी ।
पर तुमने तो छिपा रखा है,
किसी कोठी के,
किसी छोटे से गुलदस्ते में
अपने आप को
जहां मेरी पहुँच नहीं
और तुम्हारा विकास नहीं
ह्रास है,
बस ह्रास है ।

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