जिंदगी है कठिन पर मैं नहीं कोमल फूल हूँ ।
मैं शरों से बालपन से खेलता ही रहा हूँ ।
देह पर अपने हथौड़े मैं चलाता रहा हूँ ।
काट कर ये हाथ , अपने पैर, मैं लड़ता रहा हूँ ।
और मीठी नींद तजकर, रात्रि भर चलता रहा हूँ ।
तोड़ दे यूँ सहज कोई, मैं न अब मृदमूर्ति सा हूँ ।
बना निष्क्रिय किन्तु साधे भवन, खम्भा लौह का हूँ ।
जिंदगी है कठिन पर मैं नहीं कोमल फूल हूँ ।
बहुत है प्रत्यास्थता , खींचो जहाँ तक खींच पाओ ।
टूट जाऊँ बीच में -- क्या सहज दिखता है तुम्हे यह ?
जब कभी छोड़ोगे मुझको, हारकर या टूटकर ,
खींचता तुमको चला आऊँगा वापस , इस जगह पर ।
तुम बना दो मुझे , पिघलाकर, नयी आकृति स्व-इच्छित
नहीं इतना तुच्छ, कोमल याकि निर्बल मैं बना हूँ ।
जिंदगी है कठिन पर मैं नहीं कोमल फूल हूँ ।
मैं अभी जीवित, अभी मुझमें वही गति है , त्वरा है ।
अभी लड़ना जानता हूँ, मुस्कुराना जानता हूँ ।
अभी चलना लक्ष्य मेरा , दिशा मेरी है सुनिश्चित ,
अभी भँवरो और झंझा से निपटना जानता हूँ ।
कहीं होंगें तोड़ने वाले मुझे, पर सब नहीं हैं,
मैं सतह सामान्य से अब भी बहुत उँचा उठा हूँ ।
जिंदगी है कठिन पर मैं नहीं कोमल फूल हूँ ।|
---------------- Kishore Nigam / २३-१२-१९७४

