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गुरुवार, 23 जून 2016

जिंदगी है कठिन पर मैं नहीं कोमल फूल हूँ ।




 जिंदगी है कठिन पर मैं नहीं कोमल फूल हूँ ।



मैं शरों से बालपन से खेलता ही रहा हूँ ।
देह पर अपने हथौड़े मैं चलाता रहा हूँ ।
काट कर ये हाथ , अपने पैर, मैं लड़ता रहा हूँ ।
और मीठी नींद तजकर, रात्रि भर चलता रहा हूँ ।
तोड़ दे यूँ सहज कोई, मैं न अब मृदमूर्ति सा हूँ ।
बना निष्क्रिय किन्तु साधे भवन, खम्भा लौह का हूँ ।
जिंदगी है कठिन पर मैं नहीं कोमल फूल हूँ ।
बहुत है प्रत्यास्थता , खींचो जहाँ तक खींच पाओ ।
टूट जाऊँ बीच में -- क्या सहज दिखता है तुम्हे यह ?
जब कभी छोड़ोगे मुझको, हारकर या टूटकर ,
खींचता तुमको चला आऊँगा वापस , इस जगह पर ।
तुम बना दो मुझे , पिघलाकर, नयी आकृति स्व-इच्छित
नहीं इतना तुच्छ, कोमल याकि निर्बल मैं बना हूँ ।
जिंदगी है कठिन पर मैं नहीं कोमल फूल हूँ ।
मैं अभी जीवित, अभी मुझमें वही गति है , त्वरा है ।
अभी लड़ना जानता हूँ, मुस्कुराना जानता हूँ ।
अभी चलना लक्ष्य मेरा , दिशा मेरी है सुनिश्चित ,
अभी भँवरो और झंझा से निपटना जानता हूँ ।
कहीं होंगें तोड़ने वाले मुझे, पर सब नहीं हैं,
मैं सतह सामान्य से अब भी बहुत उँचा उठा हूँ ।
जिंदगी है कठिन पर मैं नहीं कोमल फूल हूँ ।|
---------------- Kishore Nigam / २३-१२-१९७४

यह जीवन की साँझ, और यह लम्बा रस्ता !


 यह जीवन की साँझ, और यह लम्बा रस्ता !

यह जीवन की साँझ, और यह लम्बा रस्ता !
शैशव में आदर्शो की गठरी सर माथे
यौवन में कर्तव्यबोध, उल्लास भगाता
घिसी-पिटी राहों पर चलने की मज़बूरी
और उमंगें सत्वहीनता से पदमर्दित
क्षमताओं, साधनों, परिस्थितियों
में कैसी यह घोर विषमता ?
यह जीवन की साँझ और यह लम्बा रस्ता !

जो गुरुवों ने, पितृजनों ने समझाया , सब झूँठा निकला
फिर भी झूंठे आदर्शों को छोड़ सके क्या ?
मूलभूत जो नियम, नींव जो हैं समाज के
उनसे ही सब छले नहीं हैं गए यहाँ क्या ?
कीट पतंगे सदा नियम जालों में फँसते
मकड़जाल क्या बाँध किसी हाथी को सकता ?
इससे तो वह 'मत्स्य न्याय' ही ज्यादा अच्छा
प्रकृति नियम पहचान हिरन संतोष मानता
किसी 'शेर से छला गया-'- -यह दुःख न होता |
यह जीवन की साँझ, और यह लम्बा रस्ता !
सम्बन्धों की सहज नींव बस एक अटल विश्वास |
और इसी विश्वास की जड़ में छिप हुआ विष-वास ||
दोषी कौन कौन निर्दोषी , कौन सका पहचान ?
हर निश्छल मन को कुरेद कर ढूंढा जाता स्वार्थ ।
अस्थिर सदा प्रेम बुनियादें , ज्यों पानी पर लेख
झूँठा झूँठा बस झूँठा है कथित प्रेम-आधार ||
"चाहों का कोई जाल नहीं था "-- क्यों कोई विश्वास करे ?
झूँठे आरोपों को सहते तन मन सारा टूट चुका अब
अब तो अंतिम नींद पास आ , तेरा आलिंगन ललचाता
जीवन की यह साँझ और यह लम्बा , कितना लम्बा रस्ता !
------------------- Kishore Nigam / १८-०६-२०१६