भाव वातचक्र
( भ्रष्टाचार, अन्याय, अत्याचार, पाखंड, छल, द्वेष, दंभ, संवेदनहीनता के विरुद्ध )
मस्तिष्क में है एक अंधड़ व्याप्त होता
जीवन-जगत के क्षेत्र में भी यदि कहीं वह उतर आता
विश्व के अगणित ह्रदय का शूल बनकर
मस्तिष्क में है एक अंधड़ व्याप्त होता
जीवन-जगत के क्षेत्र में भी यदि कहीं वह उतर आता
विश्व के अगणित ह्रदय का शूल बनकर
सकारण वह रूद्र का त्रिशूल बनकर विश्व-अंतर में धंसकता l
सम्पूर्ण स्थावर जगत पावक महार्णव एक बनता l
और जंगम सब जगत, उस पर लटकते
क्षीणतम रज्जुका-कृत हिंडोल पर
भयभीत होकर, त्रस्त होकर
झूलता रहता l
और मैं --
मेमने का वधिक बनकर, सकल जग को
निज भयंकर अट्टहासों से गुँजाता l
ब्रह्माण्ड के प्रत्येक अणु में
मैं महाव्यापक- विराट- स्वरुप होकर
महा कुत्सितता समेटे
हँसता , चिल्लाता
और अट्टहास करता l
......................Kishore Nigam / January, 1970


































