पृष्ठ

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

मौन के विस्तार को अब तोडना क्यों चाहते हो ?

                                        https://www.facebook.com/kishore.nigam1

मौन के विस्तार को अब तोडना क्यों चाहते हो ?

गल चुके हैं अंग , धूमिल नेत्र , मस्तक पक चुका

दन्त-क्षय ने स्वर बिगाड़ा , ओज का यौवन हरा
काँपता स्वर भरभराता,समझ आने में कठिन
कांपती है देह , भावों में न अब कुछ रस बचा
उपहास का, परिहास का क्यों पात्र गढ़ना चाहते हो ?
मौन के विस्तार को अब तोडना क्यों चाहते हो ?

कहाँ वह वाणी, लगा करती थी, जो लोकोत्तर ?

कहाँ वह वाणी, जिसे सुन उठा करता मन सिहर ?
कहाँ वह वाणी, कहाँ जीवित बचे वे भाव अब ?
अलौकिक संसार के दिखला सकें जो चित्र नव ?
मात्र थोथे शब्द अस्फुट क्यों बिखेरा चाहते हो ?
मौन के विस्तार को अब तोडना क्यों चाहते हो ?

था सक्रिय मुझमें विधाता, किन्तु क्या रचता रहा !

जीव अक्षम, अप्रयोगिक ,ध्वंश बस गढ़ता रहा !
माँगते हैं अर्धनिर्मित अंश अपनी पूर्णता को ...
क्षोभ उनका, दुःख उनका , क्या कभी भी नप सका ?
मत पढो , मत सुनो मुझको , क्यों बिखरना चाहते हो ?
मौन के विस्तार को अब तोडना क्यों चाहते हो ?

----------------किशोर निगम / १३/ ०१/ २००4

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें