चाह !
मैंने क्या चाहा था तुमसे ?
बस विश्वास के उस अनंत सागर की एक बूँद
जिसे ,(अपनी कल्पना में )
तुम्हारे अन्दर लहराता देखा था मैंने
और इस चाह का
क्या-क्या मूल्य नहीं दिया था मैंने ?
फिर भी तुम मुकर गए
क्यों ?
शायद इस लिए कि
वह पूरा सागर बेंच चुके थे तुम
केवल अपशिष्ट-विसर्जन की भांति,
सहज-क्रिया-स्वरुप बह निकले
आँसुवों के परनाले को ।
या फिर कोढ़ी-भिखारी के उन दो हाथों को
जिन पर कोहिनूर हीरे से
टपक पड़े थे तुम
और बजाय तुम्हें तराशकर चमकाने के ,
उन दो हाथों ने
गाड़ दिया था तुम्हें
जमीन के अन्दर
कम्पोस्ट खाद बनने को . ।
या, शायद इसलिए कि
मेरा दिया हुआ मूल्य
बहुत कम लगा था तुम्हे ।
पर तुम भूल गए कि
उस सागर को पाने का
मेरा और केवल मेरा , पूरा अधिकार था .
क्योंकि , मैं ही था जो तुम्हारे अंतर की
अनंत गहराइयों में डुबकी लगा
तुम्हारे अन्दर छिपे उस खजाने का ,
पता लगा लाया था ,
और तुम्हारी एक सीप में,
छिपा मोती दिखाकर
बताना चाहता था इसका पता
सारे जग को ।
जिसको सारे जग में लुटाने की तमन्ना
तुम्हारी पहली और अंतिम तमन्ना थी ।
तुम भूल गए कि उस अधिकार के लिए
मेरा कोई मूल्य देना भी
आवश्यक नहीं था ,
क्योंकि पूरे से ज्यादा मूल्य
मैं पहले ही दे चुका था ।
.............KN/23/09/75
वह पूरा सागर बेंच चुके थे तुम
केवल अपशिष्ट-विसर्जन की भांति,
सहज-क्रिया-स्वरुप बह निकले
आँसुवों के परनाले को ।
या फिर कोढ़ी-भिखारी के उन दो हाथों को
जिन पर कोहिनूर हीरे से
टपक पड़े थे तुम
और बजाय तुम्हें तराशकर चमकाने के ,
उन दो हाथों ने
गाड़ दिया था तुम्हें
जमीन के अन्दर
कम्पोस्ट खाद बनने को . ।
या, शायद इसलिए कि
मेरा दिया हुआ मूल्य
बहुत कम लगा था तुम्हे ।
पर तुम भूल गए कि
उस सागर को पाने का
मेरा और केवल मेरा , पूरा अधिकार था .
क्योंकि , मैं ही था जो तुम्हारे अंतर की
अनंत गहराइयों में डुबकी लगा
तुम्हारे अन्दर छिपे उस खजाने का ,
पता लगा लाया था ,
और तुम्हारी एक सीप में,
छिपा मोती दिखाकर
बताना चाहता था इसका पता
सारे जग को ।
जिसको सारे जग में लुटाने की तमन्ना
तुम्हारी पहली और अंतिम तमन्ना थी ।
तुम भूल गए कि उस अधिकार के लिए
मेरा कोई मूल्य देना भी
आवश्यक नहीं था ,
क्योंकि पूरे से ज्यादा मूल्य
मैं पहले ही दे चुका था ।
.............KN/23/09/75

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