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गुरुवार, 16 अगस्त 2012

कहाँ है स्वतंत्रता ?



कहाँ है स्वतंत्रता ?

कहाँ है स्वतंत्रता ?

हम पंछी हैं ,
स्वतंत्र और उन्मुक्त ।
पंछी भी कैसे !
जो मुक्त गगन में उड़ते ,
उन्मुक्त उड़ते , स्वतंत्र हो विचरते ।

पर यह स्वतंत्रता कैसी ?

बहेलियों के डर से धरती पर आते नहीं ,
बाजों के झुण्ड में फंसे , फडफडाते हैं ,
उनके ही भय  से हम झुण्ड में रहते हैं ,
अपने ही शक्तिशाली बन्धुवों की सहते मार
मार नहीं सहते, तो मार दिए जाते हैं ।

व्याप्त जहरीला धुवां गगन में परितः
धुवें के कारण आकाश में रह सकते  नहीं ,
फिर भी हम मुक्त हैं गगन में रहने को ।

व्याधों का झुण्ड धरती पर है सर्वतः ,
हर क्षण, नीचे है मौत की सम्भावना ,
फिर भी हम मुक्त हैं धरती पर आने को ।

घोंसलों में गंध, दुर्गन्ध , कठिनाइयां ही ,
फिर भी हम मुक्त हैं , घोंसलों में रहने को ।

घोंसले  भी वर्षा में टूट गए , साधन नहीं ,
पर हम तो मुक्त हैं घोंसले बनाने को ।

जिन्दा रहने को कोई भी उपाय नहीं
कोई भी उपाय नहीं, कोई भी उपाय नहीं
फिर भी हम मुक्त हैं जिन्दा रहने को ।

कैसी यह स्वतंत्रता ? किस आज़ादी यह ?
सब और बेबसी, घुटन , निरीहता
जीना कौन चाहता है जिंदगी ऐसी पर
मरने के लिए भी है तो, पर कहाँ है ?
कहाँ है ? कहाँ है ? कहाँ है स्वतंत्रता ?
.............किशोर निगम / ०७/०८/१९७१

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