रेगिस्तान
तुम किसी को "अपना" मत कहो ।मत कहो, मत कहो ।
तुम्हारी इस बात को सुनकर,
जंगलों में आग लग जाती है ।
नदियाँ सूख जाती हैं ।
पहाड़ों की छाती फट जाती है ।
वही पहाड़, ,
जिनकी कोख से निकला मैं हिमनद
तुम्हारी यह "अपना - अपना " की पुकार सुन ,
सागर तुम्हे समझ ,
गोद में तुम्हारी,
कूद पडा था ,
किलकते बालक सा ।
पर तुम,
तुम तो अपार रेगिस्तान थे ,
सोख गए मुझे ,
पूरा का पूरा ।
वही पहाड़, ,
जिनकी कोख से निकला मैं हिमनद
तुम्हारी यह "अपना - अपना " की पुकार सुन ,
सागर तुम्हे समझ ,
गोद में तुम्हारी,
कूद पडा था ,
किलकते बालक सा ।
पर तुम,
तुम तो अपार रेगिस्तान थे ,
सोख गए मुझे ,
पूरा का पूरा ।
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