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सोमवार, 20 अगस्त 2012

बदलो एक एक परिभाषा

कोई आग्रह नहीं , कोई सलाह नहीं , बस एक विचार , जो शायद कुछ सोचने को प्रेरित करे :---

 बदलो एक एक परिभाषा

"धर्म" छलाओं का हुजूम है ,
"नैतिकता " समूह-सम्मोहन
"प्रेम"द्रोह की परा काष्ठा ,
"प्रजातंत्र" भेड़ों का रेवड़
"दम" मन के रोगों का अर्जक ,
"धृति" खूसट नेता का साधन
"दया" आत्मश्लाघा का सुख,
"ईमां" आत्मद्रोह का कारण
सत्य एक घायल अपंग पशु,
आधि व्याधि से ग्रसित जर्जरित
"निष्ठां" छल द्रोणाचार्यों का ,
"दान"मूर्खता बलि दानव की
"आत्मा" कल्पित तत्व बुद्धि का ,
जिसके सुख का स्वप्न सजाकर
व्यक्ति सत्य-ईमान-धर्म मिस
आत्मद्रोह का पाप कमाता
संस्कारों की एक विवशता ,
दूजे युग की घृणित व्यवस्था
मत पीसो जग को पाटों में ,
बदलो एक एक परिभाषा


                           .............. किशोर निगम ..२३.०९.१९८२ 

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