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रविवार, 19 अगस्त 2012

तुम कहाँ से आ गए हो यहाँ पर ?



कभी ऐसी भी स्थितियां आती हैं  कि मन अपने से ऐसे  अनुत्तरित प्रश्न पूंछने लगता है. कब आती हैं ? शायद तब ,जब जो आदर्श सिखाये जाते हैं , वह सब झूंठे दिखने लगते हैं , या तब जब तमाम  आस्थाएं, झूंठे भ्रम दिखने लगते हैं  :-------

कौन हो तुम ?
तुम कहाँ से आ गए हो यहाँ पर ?            
यहाँ पर, जीवन जहां पर सड़ रहा है
यहाँ पर तीखा धुवाँ धुंधुवा रहा है !
लिजलिजे विषधर यहाँ पर घूमते है
डंक वृश्चिक भी उठाये झूमते है !

टूटता है नीड़ उल्का पात से
घोर रव से चटकती है सब शिलाएं
विष गगन बरसता है
रक्त मुँह से चन्द्रमा भी उगलता है !
सूर्य की छाती जमी हिमपात से
और वृक्षों की शिखाएं जल रही हैं !
पिघलकर उडगन टपकते अंध तम में
घुस रहीं जलती सलाखें पुतलियों में !                 
उड़ रहे पर्वत उठाये पंख अपने           
बाढ़ में सब गाँव , सारे बह गए हैं !                 
पंछियों को भूनता है व्याध निर्मम
रक्त सारी नसों का पानी बना है !

भाग जाओ , भाग जाओ , क्यों खड़े हो ?
कौन हो तुम ? क्यों निरर्थक जल रहे हो ?
तुम कहाँ से आ गए हो यहाँ पर ?
तुम कौन हो ?
            किशोर निगम / २६/१२/१९७४

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