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शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

मैं महासागर हूँ !

मैं महासागर हूँ !


बात-बात में झरते ये आंसू ,
बस इन्हें देखकर ही क्या ,
कहते हो मुझे पोखर ?                                               
पर ये तो ,
मेरे अन्दर अनवरत खेलती
मस्त लहरों की अठखेलियाँ हैं
जो तुम्हें ऊपर से नीचे तक
भिगो जाती हैं .
सुनो मेरी उछलती लहरों का शोर
मैं छिछला पोखर नहीं ,
वास्तव में , महासागर हूँ . ।

पूरे चाँद के दिन
मेरे ज्वार-भाटे का भयानक शोर
क्या तुम नहीं सुनते ?
क्या मेरे अन्दर के खारेपन का परीक्षण ,
तुम नहीं कर पाते ?
क्या नहीं सुनी
मेरी बाड़वज्वाला में नष्ट हो गए ,
विशालकाय जहाजों की
अगणित कहानियां ?

मुझमें तैरना सरल है --- इस भ्रम में
आगे मत बढना .
लहरें अनंत में खींच ले जायेंगी ।

मेरे तटों पर पड़े ये मोती देखो
क्या नहीं बताते ये कहानी
उन खजानों की ,
गर्भ में अपने जो , मैंने छिपा रखे हैं ?
डूबो और पाओ ।

क्या नहीं सुनी मेरे अन्दर तैरती ,
उन विशाल मछलियों की कथाएं
खा जाती हैं जो क्षण में नाविकों को ?
ये वही जीव हैं ,
जिनके आंसू कोई देखता नहीं ।

नहीं , तुम्हारे कह देने भर से ,
मैं पोखर नहीं हो सकता
नहीं है यह कोई गर्वोक्ति . यही सत्य है --
मैं महासागर हूँ , महासागर रहूँगा ।

.............किशोर निगम /२३-०९-१९८२

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