लोकोत्तर पदचाप
गूंजती पदचाप तेरी कर्ण में रह रह मुखर सी
कौन जाने पग तुम्हारे शून्य में कैसे चलेंगे
कौन जाने किस तरह मरुभूमि पर बादल घिरेंगे
अस्तित्व भी तेरा नहीं युग प्रस्थ पर ए मानसी
गूंजती पदचाप तेरी कर्ण में रह रह मुखर सी
नहीं सत्ता कभी तेरी कहीं थी न अभी है
पर मुझे स्पष्ट ही तू सदा दिखती रही है
कोमल चरण को भूमि पर रखते हुए , डरती हुई सी
गूंजती पदचाप तेरी कर्ण में रह रह मुखर सी
हूँ प्रतीक्षा रत , प्रतीक्षा में प्रतीक्षा बन गया मैं
कभी जीवन बह रहा था, आज तो जड़ बन गया मैं
मौत के भी बाद जड़ आँखें प्रतीक्षा में खुली सी
गूंजती पदचाप तेरी कर्ण में रह रह मुखर सी
शून्य है चहुँ और मेरे , शून्य है अन्तः करण में
शून्य है सत्ता जगत की , शून्य ही मैं बन गया हूँ
शून्य में तू शून्य बन , इस शून्य पर हंसती हुई सी
गूंजती पदचाप तेरी कर्ण में रह रह मुखर सी
...........Kishore Nigam / 18.02.1974

बहुत अच्छी रचना आपने लिखी है
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