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मैं अनंत का पथिक !
मैं अनंत का पथिक, यहाँ कैसे रुक जाऊं ?
मौत मेरी संगिनी-चिर , नित-नवेली, यौवना-नव ,
चिर-सुहागन, दूर पर , घूघट उठाये ताकती है
मुझे जाना प्रियतमा तक, मंद पग कैसे मैं कर लूँ ?
मैं अनंत का पथिक, यहाँ कैसे रुक जाऊं ?
ओ जीवन की सुकुमारि- नारि ! तुम तो केवल पथ-निर्झर हो
मैं महाशून्य का महाराज, तुम तो क्षणिका की दासी हो
तुमको अर्पण कर यह जीवन , क्यों मैं अपना मान घटाऊँ ?
मैं अनंत का पथिक, यहाँ कैसे रुक जाऊं ?
मैं श्रांत पथिक , इस कुटिया में , दो क्षण को निद्रा-सुख ले लूँ
तू द्वार बंद कर मत अपना , मैं दो क्षण यहाँ शरण ले लूँ
पर भूल प्रिय को , कैसे तेरा पंकिल आँचल थामूँ ?
मैं अनंत का पथिक, यहाँ कैसे रुक जाऊं ?
ओ जीवन की सुकुमारि- नारि ! तुम तो केवल पथ-निर्झर हो
मैं महाशून्य का महाराज, तुम तो क्षणिका की दासी हो
तुमको अर्पण कर यह जीवन , क्यों मैं अपना मान घटाऊँ ?
मैं अनंत का पथिक, यहाँ कैसे रुक जाऊं ?
मैं श्रांत पथिक , इस कुटिया में , दो क्षण को निद्रा-सुख ले लूँ
तू द्वार बंद कर मत अपना , मैं दो क्षण यहाँ शरण ले लूँ
पर भूल प्रिय को , कैसे तेरा पंकिल आँचल थामूँ ?
मैं अनंत का पथिक, यहाँ कैसे रुक जाऊं ?
...........Kishore Nigam / 18.02.1974

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