अग्निवीणा
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गुरुवार, 16 अगस्त 2012
ये खारा पानी है
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दम भले कितना ही हो इन उफनती साँसों में ,
समंदर चाहतों का तो पार कभी होता नहीं
गला देता है दिए गए वक्त की कश्ती
ये खारा पानी है , मीठा कभी होता ही नहीं
............
Kishore Nigam
/ 25/07/2012
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