"समग्र क्रान्ति " के प्रति ...........
https://www.facebook.com/pages/Satya-Kishore/275039235935734
क्रांति के गीत गा ओ मुखर भारती ! नव किरण पुंज तेरी करे आरती !
बह रहा है लहू, रक्तमय है धरा , आज शोणित नसों का गगन व्याप्त है
छिप रहे है नखत चन्द्र, सन सन पवन, ,तेज को साथ ले हो रहा तप्त है
आज धरती पहनकर चुनर रक्त की , वीर- बलि से सजी बन रही है दुल्हन
भोर की छोर से उठ रही है किरण , वीर बाला बनी है नवेली दुल्हन
आततायी के क़दमों को रोको , बढ़ो ,और विजयश्री वरो, कह रही भारती
क्रांति के गीत गा ओ मुखर भारती ! नव किरण पुंज तेरी करे आरती !
पूर्व में है कलरव विहग वृन्द का , रक्त आभा उभरती नए सूर्य की
मृत्यु प्याले छलकते लिए हाथ में , वीर बढ़- बढ़ पकड़ते चुनर मृत्यु की
रो उठा है कहाँ स्यार गर्जन को सुन, सिंह अंगडाईयाँ ले रहा है नयी
मस्त गज चल पड़ा है नए पंथ पर , भौंकते स्वान उनकी खबर कुछ नहीं
उठ पड़ो, उठ पड़ो, -- कह रही है धरा , कह रही है दिशा , कह रही भारती
क्रांति के गीत गा ओ मुखर भारती ! नव किरण पुंज तेरी करे आरती !
आज मन की सभी त्याग कमजोरियां , उठ पड़ो ओ जलधि ! फिर नए ज्वार ले
आज छाया है नभ में ये सावन का घन, नाच दे ऐ मयूरी नए जोश से
आज आई नयी पूर्णिमा क्रान्ति की ,ओ खिलो चंद्रमुख- पुष्प , नव गंध ले
फिर दिशायें नयी दे रही हैं दिशा , चल पड़ो मन में फिर एक नया ध्येय ले
बढ़ चलो , बढ़ चलो, -- कह रह है पवन, कह रही चेतना, कह रही भारती.
क्रांति के गीत गा ओ मुखर भारती ! नव किरण पुंज तेरी करे आरती !
.................किशोर निगम/ ०५-११-१९७४

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें