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मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

तुम कहाँ से आ गए हो यहाँ पर ?


 
दमनकारी सामाजिक,अन्धविश्वासी  धर्मांध, प्रगतिरोधी धारणाओं से प्राप्त उत्पीडन से जनित क्षुब्ध
निः श्वांस :-----

कौन हो तुम ?                                  

तुम कहाँ से
आ गए हो यहाँ पर ?                     
यहाँ पर, जीवन जहां पर सड़ रहा है
यहाँ पर तीखा धुवाँ धुंधुवा रहा है !
लिजलिजे विषधर यहाँ पर घूमते है
डंक वृश्चिक भी उठाये झूमते है !

टूटता है नीड़ उल्का पात से
घोर रव से चटकती है सब शिलाएं
विष गगन बरसता है

रक्त मुँह से चन्द्रमा भी उगलता है !
सूर्य की छाती जमी हिमपात से
और वृक्षों की शिखाएं जल रही हैं !
पिघलकर उडगन टपकते अंध तम में
घुस रहीं जलती सलाखें पुतलियों में !
उड़ रहे पर्वत उठाये पंख अपने
बाढ़ में सब गाँव , सारे बह गए हैं !
पंछियों को भूनता है व्याध निर्मम
रक्त सारी नसों का पानी बना है !

भाग जाओ , भाग जाओ , क्यों खड़े हो ?
कौन हो तुम ? क्यों निरर्थक जल रहे हो ?
तुम कहाँ से आ गए हो यहाँ पर ?
तुम कौन हो ?
                                     Kishore Nigam /26.12.1974


गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

स्मृति की धूमिल रेखाएं





स्मृति की धूमिल रेखाएं
, चम-चम विद्युत् सी चमक उठें ,
करुणा, तृष्णा, भय ,मोह ,क्रोध , आनंद-मेघ बन घहर उठें।,
छल- छल एकाकी जीवन-नाद , कल-कल स्वर में लहरा उट्ठे ,
मृदु-भाव- सुधा वर्षण हो, मानव-मन जिसको पी विहंस उठे ।
कुंठा, अवसाद, घृणा , तृष्णा ,करुणा ले मानव-मन आये ,
समरस भावों का रस पीकर , रसमय हो शांति सुधा पाए ।।
...............Kishore Nigam May/1973

मैं प्रपात महा जल का !


मैं प्रपात महा जल का !                                               


कल्पना की नील स्वर्णिम
परी का आँचल नहीं हूँ ।
और न ही कल्पना का
मैं भयानक दैत्य हूँ ।।

वास्तविकता के धरातल पर उमड़ता ,
दृढ़ शिलाओं पर उफन कर चोट खाता ,
तोड़ता मैं रूढ़ियों को ,
स्वयं को बिखरा रहा हूँ !
ऊंचे हिमालय से हजारों हाथ नीचे ,
ह्रदय का भय दमन करके ,
बेझिझक मैं कूदता हूँ ,
अधः गति में चल रहा हूँ ।
कल्पना की नील स्वर्णिम
परी का आँचल नहीं हूँ
और न ही कल्पना का
मैं भयानक दैत्य हूँ ।।

यह अधः गति ,पहुँच समतल में सरित का ,
रूप दे देगी मुझे उपयोगितामय ।
यह अधः गति सींच खेतों को कभी ,
शस्य- श्यामल भूमि देगी जगत को ।
यह अधः गति ही पहुंचकर अंत में
महासागर अंक भी देगी मुझे ।
यह अधः गति निरर्थक जीवन अपाकृत
को बना देगी सनिश्चय सार्थक ।
तोड़ता मैं रूढ़ियों की जड़ शिलाएं , कूल-बंधन ,
उस अपरिमित पुनर्जीवन की दिशा में बढ़ रहा हूँ ।
कल्पना की नील स्वर्णिम परी का आँचल नहीं हूँ
और न ही कल्पना का मैं भयानक दैत्य हूँ ।।

रोक कब मुझको सका ,यह जगत निर्जन निरर्थक सा,
बाढ़ में हर बाँध को मैं तोड़ता बढ़ता रहा हूँ . ।.
जब कभी मैं बंधा सीमित से क्षणों को ,
शक्ति के आह्लाद का संचार मैं करता रहा हूँ ।
सूर्य ने बेंधा सहस्रों बाण से जब ,
विश्व पर मैं मेघ बन कर छा गया हूँ ।
और सत्ता सूर्य की भी ढांप कर कुछ क्षणों को ,
ओस, कुहरा, मेघ बन बरसा किया हूँ .।
इन्द्रधनु बन बंधनों में भी विहँसता ,
शांति से मिट, बरस , फिर नद बन गया हूँ ।
कल्पना की नील स्वर्णिम परी का आँचल नहीं हूँ
और न ही कल्पना का मैं भयानक दैत्य हूँ ।।

.................... किशोर निगम /२४.१२.१९७४

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रचनाकार कौन ?

रचनाकार कौन ?


गलत कहते  हैं  लोग  
कि मैं , तुम  या वह रचनाकार  है  ।
रचनाकार  हैं
युगों  युगों  से  मानव  मन  पर
संचित  होते  असंख्य   प्रभावों  के ,  
घनीभूत असह्य क्षण .
रचनाकार हैं
युगों  युगों  से  पिए  जाते,
विष  और  अमृत  के
परिणामी प्रभाव  
जीव की सहन क्षमता को
अतिक्रमित करके  जो ,
वमन करा देते हैं .
रचना  है  वह  वमन  । .
रचनाकार  है  प्रकृति  और  परिस्थितियाँ
और  उनका  द्वंद्व  ।
रचनाकार  है
जीवन  की  गति  के  निर्णायक  क्षण
पकड़ कर युग के रथ का धुरा जो
हजारों वर्ष आगे-पीछे , खींच ले जाते हैं  ।
रचनाकार है वह क्षण ,
जो युगों युगों से भोगे गए ,
एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में संक्रमित ,
घटते बढते परिणामी प्रभाव  को
शिव  के  नीलकंठ  या  चाँद  की  हँसी  की
के रूप में प्रकट कर देता है ।
द्विक -आकर्षण  है  रचनाकार
और  शिशु  रूप  में  रचना  जन्म  लेती  है  ।
रचनाकार  है द्रौपदी -चीर-हरण,
पांडवों  का  राज्य-हरण  
महाभारत के रूप में रचना प्रकट  होती  है  ।
             ...............रचना तिथि : २४.०९.१९८२
             ..............सम्पादित/संसोधित : ११.०९.२०१२
https://www.facebook.com/pages/Satya-Kishore/275039235935734?ref=ts&fref=ts

मिठास कहाँ गयी ?

मिठास कहाँ गयी ?                                         


"तुम्हारे हाथ के
इतने मन से बनाए गए भोजन में ,
वह महक, मिठास , ताकत और सोंधापन
कहाँ चले गए ,
जो उस जंगली फल में थे ,
जिसका एक टुकड़ा तुमने दिया था मुझे कभी ,
पहले खुद चखकर .
बदले में मैंने तुम्हें दिया था वैसा ही ,
पूरा फल ........ सूंघकर ? "

बहुत देर सोचकर , उदास लहजे में ,
तुमने जवाब दिया --
"हमारी शादी को बहुत साल हो गए "

मेरे हाथ कानों पर चले गए .
सोचता हूँ -- कागज़ पर लिख दूँ --
"शादी तो हमारी हुयी ही नहीं
हुआ केवल फलों का लेन-देन . "
(क्या बिना समझे , पंडित, मौलवी,पादरी के
शब्दों को दोहराना, सर हिलाना ,
सोते सोते ,गिरते -पड़ते ,मंडप में चक्कर लगाना ,
अनचाहे, अनजाने कागजों पर हस्ताक्षर करना ,
शादी हुआ करती है ?
शादी तो है एकत्व की अनुभूति ,
और उसे अमर बनाने का दुतरफा संकल्प
सामाजिक उत्सव का अर्थ तो शादी नहीं )
वह फल भी तो लिए-दिए गए थे
हजारों साल पहले ,
जब हम कपडे पहनना नहीं जानते थे
और तुम बहुत बलिष्ठ थीं ,
शायद मुझसे ज्यादा .
आत्मिक रूप से .
छूकर तुम्हारे होठों से और मेरे हाथों से ,
भर गयी थे उन फलों में ,
विश्वास की ताकत, सच्चाई का सोंधापन ,
एक दूजे के हो जाने की भावना की मिठास ,
और नया कुछ करने की तरंग की
महक भरी हुलास ।

पर अब,
अब तुमने वह सारी पौष्टिकता
सोंधापन और महक ,
धो डाले हैं
तथाकथित संस्कृति-सभ्यता-परंपरा-प्रथा
अविश्वास- छल-प्रवंचना के खारे पानी में
किटी-पार्टी, मर्दों की निंदा ,
सोसल साइट्स के अप्डेसन में
स्टेटस के रखरखाव में .
अब तुम बहकी हो "आज़ादी" की मृगमरीचिका में
और मैं , तुम्हारी चाकरी में .
मिलकर कुछ नया करने को दुनिया के लिए,
दिमाग के किसी कोष्ठ में कुछ बचा ही नहीं
अब तुम्हारे हाथों और होठों में
चिपका है बस यह खारापन ,
इसीलिए मैं भी जो फल देता हूँ ,
वह भी मीठा न लगकर , ,
कसैला तुम्हें लगता है,
और तुम्हें इसमें भी
विष का भय दिखता है. ।
.............किशोर निगम/रचना तिथि : २३.०९.१९८२
................संसोधन /संपादन : १०.०९.२०१२
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