दमनकारी सामाजिक,अन्धविश्वासी धर्मांध, प्रगतिरोधी धारणाओं से प्राप्त उत्पीडन से जनित क्षुब्ध
निः श्वांस :-----
कौन हो तुम ?
तुम कहाँ से
आ गए हो यहाँ पर ?
यहाँ पर, जीवन जहां पर सड़ रहा है
यहाँ पर तीखा धुवाँ धुंधुवा रहा है !
लिजलिजे विषधर यहाँ पर घूमते है
डंक वृश्चिक भी उठाये झूमते है !
टूटता है नीड़ उल्का पात से
घोर रव से चटकती है सब शिलाएं
विष गगन बरसता है
रक्त मुँह से चन्द्रमा भी उगलता है !
सूर्य की छाती जमी हिमपात से
और वृक्षों की शिखाएं जल रही हैं !
पिघलकर उडगन टपकते अंध तम में
घुस रहीं जलती सलाखें पुतलियों में !
उड़ रहे पर्वत उठाये पंख अपने
बाढ़ में सब गाँव , सारे बह गए हैं !
पंछियों को भूनता है व्याध निर्मम
रक्त सारी नसों का पानी बना है !
भाग जाओ , भाग जाओ , क्यों खड़े हो ?
कौन हो तुम ? क्यों निरर्थक जल रहे हो ?
तुम कहाँ से आ गए हो यहाँ पर ?
तुम कौन हो ?
सूर्य की छाती जमी हिमपात से
और वृक्षों की शिखाएं जल रही हैं !
पिघलकर उडगन टपकते अंध तम में
घुस रहीं जलती सलाखें पुतलियों में !
उड़ रहे पर्वत उठाये पंख अपने
बाढ़ में सब गाँव , सारे बह गए हैं !
पंछियों को भूनता है व्याध निर्मम
रक्त सारी नसों का पानी बना है !
भाग जाओ , भाग जाओ , क्यों खड़े हो ?
कौन हो तुम ? क्यों निरर्थक जल रहे हो ?
तुम कहाँ से आ गए हो यहाँ पर ?
तुम कौन हो ?
Kishore Nigam /26.12.1974
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