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गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

स्मृति की धूमिल रेखाएं





स्मृति की धूमिल रेखाएं
, चम-चम विद्युत् सी चमक उठें ,
करुणा, तृष्णा, भय ,मोह ,क्रोध , आनंद-मेघ बन घहर उठें।,
छल- छल एकाकी जीवन-नाद , कल-कल स्वर में लहरा उट्ठे ,
मृदु-भाव- सुधा वर्षण हो, मानव-मन जिसको पी विहंस उठे ।
कुंठा, अवसाद, घृणा , तृष्णा ,करुणा ले मानव-मन आये ,
समरस भावों का रस पीकर , रसमय हो शांति सुधा पाए ।।
...............Kishore Nigam May/1973

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