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गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

मिठास कहाँ गयी ?

मिठास कहाँ गयी ?                                         


"तुम्हारे हाथ के
इतने मन से बनाए गए भोजन में ,
वह महक, मिठास , ताकत और सोंधापन
कहाँ चले गए ,
जो उस जंगली फल में थे ,
जिसका एक टुकड़ा तुमने दिया था मुझे कभी ,
पहले खुद चखकर .
बदले में मैंने तुम्हें दिया था वैसा ही ,
पूरा फल ........ सूंघकर ? "

बहुत देर सोचकर , उदास लहजे में ,
तुमने जवाब दिया --
"हमारी शादी को बहुत साल हो गए "

मेरे हाथ कानों पर चले गए .
सोचता हूँ -- कागज़ पर लिख दूँ --
"शादी तो हमारी हुयी ही नहीं
हुआ केवल फलों का लेन-देन . "
(क्या बिना समझे , पंडित, मौलवी,पादरी के
शब्दों को दोहराना, सर हिलाना ,
सोते सोते ,गिरते -पड़ते ,मंडप में चक्कर लगाना ,
अनचाहे, अनजाने कागजों पर हस्ताक्षर करना ,
शादी हुआ करती है ?
शादी तो है एकत्व की अनुभूति ,
और उसे अमर बनाने का दुतरफा संकल्प
सामाजिक उत्सव का अर्थ तो शादी नहीं )
वह फल भी तो लिए-दिए गए थे
हजारों साल पहले ,
जब हम कपडे पहनना नहीं जानते थे
और तुम बहुत बलिष्ठ थीं ,
शायद मुझसे ज्यादा .
आत्मिक रूप से .
छूकर तुम्हारे होठों से और मेरे हाथों से ,
भर गयी थे उन फलों में ,
विश्वास की ताकत, सच्चाई का सोंधापन ,
एक दूजे के हो जाने की भावना की मिठास ,
और नया कुछ करने की तरंग की
महक भरी हुलास ।

पर अब,
अब तुमने वह सारी पौष्टिकता
सोंधापन और महक ,
धो डाले हैं
तथाकथित संस्कृति-सभ्यता-परंपरा-प्रथा
अविश्वास- छल-प्रवंचना के खारे पानी में
किटी-पार्टी, मर्दों की निंदा ,
सोसल साइट्स के अप्डेसन में
स्टेटस के रखरखाव में .
अब तुम बहकी हो "आज़ादी" की मृगमरीचिका में
और मैं , तुम्हारी चाकरी में .
मिलकर कुछ नया करने को दुनिया के लिए,
दिमाग के किसी कोष्ठ में कुछ बचा ही नहीं
अब तुम्हारे हाथों और होठों में
चिपका है बस यह खारापन ,
इसीलिए मैं भी जो फल देता हूँ ,
वह भी मीठा न लगकर , ,
कसैला तुम्हें लगता है,
और तुम्हें इसमें भी
विष का भय दिखता है. ।
.............किशोर निगम/रचना तिथि : २३.०९.१९८२
................संसोधन /संपादन : १०.०९.२०१२
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