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शुक्रवार, 3 अगस्त 2018


ग्रीक पौराणिक कथा का गहरे भारतीय रंग में डुबोया गया , पर्सियन , इजिप्शियन और वैदिक माइथोलॉजी और इतिहास की झलकियाँ दिखाता, तरलतम मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण, कवि सत्य किशोर निगम द्वारा विरचित खंडकाव्य विक्रय हेतु उपलब्ध है। कृपया विवरण जानने हेतु निन्मलिखित वेबसाइट का अवलोकन करें। सादर और साभार !
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रविवार, 30 अप्रैल 2017

Silence is greater epic than Mahabharat ,which was often difficult to understand even for the lord of wisdom,Ganesha. Speech is mostly, if not always a tool to hide and incapable to express real feels

------------------------------------------------------------------- Kishore Nigam /    29-08-2011

मौन एक महाकाव्य
घुटती विवसता का
घनीभूत पीड़ा का
झूंठे आरोपों का ,
स्वार्थी अपमानों का,
अपनों के धोखों का
अपनों की उपेक्षा का ,
अपनों के दर्दों का|
सत्ता की मदान्धता का ,
भाग्य के कुचक्रों का,
कुरीति- निर्दयता का
अंधविश्वासों की ,
बढाती हुयी सत्ता का
भीड़ की उन्मत्तता का ,
समर्थ की असमर्थता का ,
योग्य की असफलता का
भोग की निरर्थकता का
अंधों के निर्देशन का,
आत्म-परिवर्तन का
आत्मा की भौतिकता का ,
ईश्वर की अदृश्यता का
न्याय के अन्याय का 

और मत्स्य न्याय का |  


झॉँको गहराई में इसकी, तो मिलेगा
अगम सिंधु करता हुआ हाहाकारी अघोष-नाद |
गाता महाकाव्य, महाभारत से भी विशाल |
लिखने में जिसको न होंगे विनायक समर्थ |

जो कुछ लिखा गया है आजतक तो उसकी
पूर्ण व्याख्या कभी कोई भी न कर सका ,
ऋषि-वाक्य आज भी सब ही अस्पस्ष्ट हैं
शत- शत भाष्यों के सहस्रों भिन्न अर्थ हैं |

किन्तु मौन ही है , नहीं जिसमें कोई भिन्न अर्थ
छल, झूंठ, ढोंग, भ्रम, सबसे निरासक्त है ,
निश्छल हो परखो इसे, स्वार्थ में न तौलो इसे,
मौन हो पढ़ो इसे- -बस यही एक शर्त है |
--------------Kishore Nigam / ३०-०४-२०१७

 

गुरुवार, 23 जून 2016

जिंदगी है कठिन पर मैं नहीं कोमल फूल हूँ ।




 जिंदगी है कठिन पर मैं नहीं कोमल फूल हूँ ।



मैं शरों से बालपन से खेलता ही रहा हूँ ।
देह पर अपने हथौड़े मैं चलाता रहा हूँ ।
काट कर ये हाथ , अपने पैर, मैं लड़ता रहा हूँ ।
और मीठी नींद तजकर, रात्रि भर चलता रहा हूँ ।
तोड़ दे यूँ सहज कोई, मैं न अब मृदमूर्ति सा हूँ ।
बना निष्क्रिय किन्तु साधे भवन, खम्भा लौह का हूँ ।
जिंदगी है कठिन पर मैं नहीं कोमल फूल हूँ ।
बहुत है प्रत्यास्थता , खींचो जहाँ तक खींच पाओ ।
टूट जाऊँ बीच में -- क्या सहज दिखता है तुम्हे यह ?
जब कभी छोड़ोगे मुझको, हारकर या टूटकर ,
खींचता तुमको चला आऊँगा वापस , इस जगह पर ।
तुम बना दो मुझे , पिघलाकर, नयी आकृति स्व-इच्छित
नहीं इतना तुच्छ, कोमल याकि निर्बल मैं बना हूँ ।
जिंदगी है कठिन पर मैं नहीं कोमल फूल हूँ ।
मैं अभी जीवित, अभी मुझमें वही गति है , त्वरा है ।
अभी लड़ना जानता हूँ, मुस्कुराना जानता हूँ ।
अभी चलना लक्ष्य मेरा , दिशा मेरी है सुनिश्चित ,
अभी भँवरो और झंझा से निपटना जानता हूँ ।
कहीं होंगें तोड़ने वाले मुझे, पर सब नहीं हैं,
मैं सतह सामान्य से अब भी बहुत उँचा उठा हूँ ।
जिंदगी है कठिन पर मैं नहीं कोमल फूल हूँ ।|
---------------- Kishore Nigam / २३-१२-१९७४

यह जीवन की साँझ, और यह लम्बा रस्ता !


 यह जीवन की साँझ, और यह लम्बा रस्ता !

यह जीवन की साँझ, और यह लम्बा रस्ता !
शैशव में आदर्शो की गठरी सर माथे
यौवन में कर्तव्यबोध, उल्लास भगाता
घिसी-पिटी राहों पर चलने की मज़बूरी
और उमंगें सत्वहीनता से पदमर्दित
क्षमताओं, साधनों, परिस्थितियों
में कैसी यह घोर विषमता ?
यह जीवन की साँझ और यह लम्बा रस्ता !

जो गुरुवों ने, पितृजनों ने समझाया , सब झूँठा निकला
फिर भी झूंठे आदर्शों को छोड़ सके क्या ?
मूलभूत जो नियम, नींव जो हैं समाज के
उनसे ही सब छले नहीं हैं गए यहाँ क्या ?
कीट पतंगे सदा नियम जालों में फँसते
मकड़जाल क्या बाँध किसी हाथी को सकता ?
इससे तो वह 'मत्स्य न्याय' ही ज्यादा अच्छा
प्रकृति नियम पहचान हिरन संतोष मानता
किसी 'शेर से छला गया-'- -यह दुःख न होता |
यह जीवन की साँझ, और यह लम्बा रस्ता !
सम्बन्धों की सहज नींव बस एक अटल विश्वास |
और इसी विश्वास की जड़ में छिप हुआ विष-वास ||
दोषी कौन कौन निर्दोषी , कौन सका पहचान ?
हर निश्छल मन को कुरेद कर ढूंढा जाता स्वार्थ ।
अस्थिर सदा प्रेम बुनियादें , ज्यों पानी पर लेख
झूँठा झूँठा बस झूँठा है कथित प्रेम-आधार ||
"चाहों का कोई जाल नहीं था "-- क्यों कोई विश्वास करे ?
झूँठे आरोपों को सहते तन मन सारा टूट चुका अब
अब तो अंतिम नींद पास आ , तेरा आलिंगन ललचाता
जीवन की यह साँझ और यह लम्बा , कितना लम्बा रस्ता !
------------------- Kishore Nigam / १८-०६-२०१६

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014


रात की काली परतों सी , सघन स्मृति की रेखाएं
उठाती धीरे धीरे मुझे तुम्हारी विजड़ित सी स्मित |

निराशा भी पाऊँ कैसे, न आशा ही उपजी हो जब
विफलता भी क्यों देती साथ, सफलता की न चाह हो जब |

तुम्हे पाया, तुम्हे खोया, तुम्हारा संग विरह का गीत
तुम्हारा मौन निमंत्रण कभी, आज तक बना न मेरी जीत |

युगों से दूर, जगत के पास, पहुँचता जब जब मेरा हाथ
न मिलता कभी सहारा मुझे, उठा निष्फल ही मेरा हाथ -----
उठा निष्फल ही मेरा हाथ ----
                --------- Kishore Nigam

मंगलवार, 18 जून 2013


------------जान बेवफा निकली -----------

तुमने अपनी कमजर्फी को बता दिया "तकदीर खफा है "
उस "सच्चे "का कौन सहारा जिसकी 'जान ' 'बेवफा ' निकली ? 
रेशा रेशा तार हो गया , गुरिया गुरिया चूर हो गयी
दोजख दोजख बनी जिन्दगी , जिसकी जान बेवफा निकली .        
अगर कहीं ईश्वर दिख जाए , पकड़ गरदनी उसकी पूंछो
"तूने भोगा दर्द किसी का , जिसकी जान बेवफा निकली ?"
धज्जी धज्जी कपडे पहने , मतवाला सा घूम रहा है
मुर्दा बेटे की माँ जैसा , जिसकी जान बेवफा निकली .
नौजवान बेटे की अर्थी , अपने सीने से लिपटाए
पडा हुआ है बीच सड़क पर , इसकी जान बेवफा निकली
मंडप के ही नीचे जिसकी मांग लुटी सिंदूर लुट गया
वह अभागिनी विधवा देखो जिसकी जान बेवफा निकली
                -------------Kishore Nigam/ 13-06-2013

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

तुम कहाँ से आ गए हो यहाँ पर ?


 
दमनकारी सामाजिक,अन्धविश्वासी  धर्मांध, प्रगतिरोधी धारणाओं से प्राप्त उत्पीडन से जनित क्षुब्ध
निः श्वांस :-----

कौन हो तुम ?                                  

तुम कहाँ से
आ गए हो यहाँ पर ?                     
यहाँ पर, जीवन जहां पर सड़ रहा है
यहाँ पर तीखा धुवाँ धुंधुवा रहा है !
लिजलिजे विषधर यहाँ पर घूमते है
डंक वृश्चिक भी उठाये झूमते है !

टूटता है नीड़ उल्का पात से
घोर रव से चटकती है सब शिलाएं
विष गगन बरसता है

रक्त मुँह से चन्द्रमा भी उगलता है !
सूर्य की छाती जमी हिमपात से
और वृक्षों की शिखाएं जल रही हैं !
पिघलकर उडगन टपकते अंध तम में
घुस रहीं जलती सलाखें पुतलियों में !
उड़ रहे पर्वत उठाये पंख अपने
बाढ़ में सब गाँव , सारे बह गए हैं !
पंछियों को भूनता है व्याध निर्मम
रक्त सारी नसों का पानी बना है !

भाग जाओ , भाग जाओ , क्यों खड़े हो ?
कौन हो तुम ? क्यों निरर्थक जल रहे हो ?
तुम कहाँ से आ गए हो यहाँ पर ?
तुम कौन हो ?
                                     Kishore Nigam /26.12.1974


गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

स्मृति की धूमिल रेखाएं





स्मृति की धूमिल रेखाएं
, चम-चम विद्युत् सी चमक उठें ,
करुणा, तृष्णा, भय ,मोह ,क्रोध , आनंद-मेघ बन घहर उठें।,
छल- छल एकाकी जीवन-नाद , कल-कल स्वर में लहरा उट्ठे ,
मृदु-भाव- सुधा वर्षण हो, मानव-मन जिसको पी विहंस उठे ।
कुंठा, अवसाद, घृणा , तृष्णा ,करुणा ले मानव-मन आये ,
समरस भावों का रस पीकर , रसमय हो शांति सुधा पाए ।।
...............Kishore Nigam May/1973

मैं प्रपात महा जल का !


मैं प्रपात महा जल का !                                               


कल्पना की नील स्वर्णिम
परी का आँचल नहीं हूँ ।
और न ही कल्पना का
मैं भयानक दैत्य हूँ ।।

वास्तविकता के धरातल पर उमड़ता ,
दृढ़ शिलाओं पर उफन कर चोट खाता ,
तोड़ता मैं रूढ़ियों को ,
स्वयं को बिखरा रहा हूँ !
ऊंचे हिमालय से हजारों हाथ नीचे ,
ह्रदय का भय दमन करके ,
बेझिझक मैं कूदता हूँ ,
अधः गति में चल रहा हूँ ।
कल्पना की नील स्वर्णिम
परी का आँचल नहीं हूँ
और न ही कल्पना का
मैं भयानक दैत्य हूँ ।।

यह अधः गति ,पहुँच समतल में सरित का ,
रूप दे देगी मुझे उपयोगितामय ।
यह अधः गति सींच खेतों को कभी ,
शस्य- श्यामल भूमि देगी जगत को ।
यह अधः गति ही पहुंचकर अंत में
महासागर अंक भी देगी मुझे ।
यह अधः गति निरर्थक जीवन अपाकृत
को बना देगी सनिश्चय सार्थक ।
तोड़ता मैं रूढ़ियों की जड़ शिलाएं , कूल-बंधन ,
उस अपरिमित पुनर्जीवन की दिशा में बढ़ रहा हूँ ।
कल्पना की नील स्वर्णिम परी का आँचल नहीं हूँ
और न ही कल्पना का मैं भयानक दैत्य हूँ ।।

रोक कब मुझको सका ,यह जगत निर्जन निरर्थक सा,
बाढ़ में हर बाँध को मैं तोड़ता बढ़ता रहा हूँ . ।.
जब कभी मैं बंधा सीमित से क्षणों को ,
शक्ति के आह्लाद का संचार मैं करता रहा हूँ ।
सूर्य ने बेंधा सहस्रों बाण से जब ,
विश्व पर मैं मेघ बन कर छा गया हूँ ।
और सत्ता सूर्य की भी ढांप कर कुछ क्षणों को ,
ओस, कुहरा, मेघ बन बरसा किया हूँ .।
इन्द्रधनु बन बंधनों में भी विहँसता ,
शांति से मिट, बरस , फिर नद बन गया हूँ ।
कल्पना की नील स्वर्णिम परी का आँचल नहीं हूँ
और न ही कल्पना का मैं भयानक दैत्य हूँ ।।

.................... किशोर निगम /२४.१२.१९७४

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रचनाकार कौन ?

रचनाकार कौन ?


गलत कहते  हैं  लोग  
कि मैं , तुम  या वह रचनाकार  है  ।
रचनाकार  हैं
युगों  युगों  से  मानव  मन  पर
संचित  होते  असंख्य   प्रभावों  के ,  
घनीभूत असह्य क्षण .
रचनाकार हैं
युगों  युगों  से  पिए  जाते,
विष  और  अमृत  के
परिणामी प्रभाव  
जीव की सहन क्षमता को
अतिक्रमित करके  जो ,
वमन करा देते हैं .
रचना  है  वह  वमन  । .
रचनाकार  है  प्रकृति  और  परिस्थितियाँ
और  उनका  द्वंद्व  ।
रचनाकार  है
जीवन  की  गति  के  निर्णायक  क्षण
पकड़ कर युग के रथ का धुरा जो
हजारों वर्ष आगे-पीछे , खींच ले जाते हैं  ।
रचनाकार है वह क्षण ,
जो युगों युगों से भोगे गए ,
एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में संक्रमित ,
घटते बढते परिणामी प्रभाव  को
शिव  के  नीलकंठ  या  चाँद  की  हँसी  की
के रूप में प्रकट कर देता है ।
द्विक -आकर्षण  है  रचनाकार
और  शिशु  रूप  में  रचना  जन्म  लेती  है  ।
रचनाकार  है द्रौपदी -चीर-हरण,
पांडवों  का  राज्य-हरण  
महाभारत के रूप में रचना प्रकट  होती  है  ।
             ...............रचना तिथि : २४.०९.१९८२
             ..............सम्पादित/संसोधित : ११.०९.२०१२
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