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गुरुवार, 23 जून 2016

यह जीवन की साँझ, और यह लम्बा रस्ता !


 यह जीवन की साँझ, और यह लम्बा रस्ता !

यह जीवन की साँझ, और यह लम्बा रस्ता !
शैशव में आदर्शो की गठरी सर माथे
यौवन में कर्तव्यबोध, उल्लास भगाता
घिसी-पिटी राहों पर चलने की मज़बूरी
और उमंगें सत्वहीनता से पदमर्दित
क्षमताओं, साधनों, परिस्थितियों
में कैसी यह घोर विषमता ?
यह जीवन की साँझ और यह लम्बा रस्ता !

जो गुरुवों ने, पितृजनों ने समझाया , सब झूँठा निकला
फिर भी झूंठे आदर्शों को छोड़ सके क्या ?
मूलभूत जो नियम, नींव जो हैं समाज के
उनसे ही सब छले नहीं हैं गए यहाँ क्या ?
कीट पतंगे सदा नियम जालों में फँसते
मकड़जाल क्या बाँध किसी हाथी को सकता ?
इससे तो वह 'मत्स्य न्याय' ही ज्यादा अच्छा
प्रकृति नियम पहचान हिरन संतोष मानता
किसी 'शेर से छला गया-'- -यह दुःख न होता |
यह जीवन की साँझ, और यह लम्बा रस्ता !
सम्बन्धों की सहज नींव बस एक अटल विश्वास |
और इसी विश्वास की जड़ में छिप हुआ विष-वास ||
दोषी कौन कौन निर्दोषी , कौन सका पहचान ?
हर निश्छल मन को कुरेद कर ढूंढा जाता स्वार्थ ।
अस्थिर सदा प्रेम बुनियादें , ज्यों पानी पर लेख
झूँठा झूँठा बस झूँठा है कथित प्रेम-आधार ||
"चाहों का कोई जाल नहीं था "-- क्यों कोई विश्वास करे ?
झूँठे आरोपों को सहते तन मन सारा टूट चुका अब
अब तो अंतिम नींद पास आ , तेरा आलिंगन ललचाता
जीवन की यह साँझ और यह लम्बा , कितना लम्बा रस्ता !
------------------- Kishore Nigam / १८-०६-२०१६

3 टिप्‍पणियां:

  1. कविता अनावश्यक रुप विस्तृत कर रसहीन बना दिया गया है।

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    1. आभार prsingh bal जी, आपकी टिपण्णी व मार्गदर्शन के लिए ! यह कविता ( यदि इसे कविता कहा जा सके तो) वास्तव में, रचना कम , एक स्वतः स्फूर्त भाव-प्रवाह अधिक है, जैसी कि मेरी प्रायः सभी रचनाएं होती हैं ! रस-सिद्धि प्रायः मेरा उद्देश्य नहीं होता ! फिर भी भविष्य में आपकी मूल्यवान आख्या का ध्यान रखने का प्रयास करूंगा !--- Kishore Nigam

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  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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