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सोमवार, 28 मई 2012

हाँ नींद हमें भी आती है !



हाँ नींद हमें भी आती है !

हम दुःख-दारिद्र्य की भट्ठी में जल कर भी खुश रह लेते हैं
हम मात-पिता का साया उठ जाने पर भी जी लेते हैं
हमने भी सपने पाले हैं, खुशियाँ हमको भी मिलती हैं
हाँ नींद हमें भी आती है !

हमको देखो तब समझोगे की प्यार का मतलब क्या होता
हमको देखो तब समझोगे संघर्ष का मतलब क्या होता
हमको देखो तब समझोगे कैसे जिन्दगी पनपती है
हाँ नींद हमें भी आती है

                            ......................Kishore Nigam/ 14-11-2011

तुम सूने मंदिर के दीपक की लौ बन आओ


तुम सूने मंदिर के दीपक की लौ बन आओ
मैं ज्योति तुम्हारी लेकर झलमल चमक पडूँ
तुम अन्धकार में किरन रेख बन कौंधो
मैं अन्धकार बन सघन समाहित तुमको कर लूँ





झरते झर-झर झरने मन में , कल- कल स्वर में जब हँसती तुम
मर-मर-मर पल्लव हिल उठते,होठों पर शब्द धारतीं तुम
सतरंगी तितलियाँ मन-वन में, उड़ रहीं तुम्हारी मुस्कानें
मैं दौड़ दौड़ कर उपवन में ये रंगमय मुस्कानें पकडूँ


विद्युत् के कण स्नान कराते हैं मुझको,
मखमली करों से जब तुम मुझको छू देतीं
अमृत का नाद फिर शांत स्वरों में बह पड़ता

लज्जा से , धीरे से जब तुम मुसका देतीं
दो क्षण को जैसे विश्व रुके , जम जाए वहीँ
जब कृष्ण- कोर का हालाहल छलका देतीं
बेबस तन बहा, खिंचा जाता तुम तक फिर- फिर

मद- नद बन जब तुम प्रखर वेग से बह पडतीं

तुम धरा बन , ले सुधा, गरल, मद बह निकलो
मैं सागर बन कर तुम्हें आत्म- संस्थित कर लूँ
तुम इन्द्र धनुष सी मन- नभ पर तिरछी छिटको
मैं सावन-घन बन बार बार तुमको ढापूं
तुम नीलाम्बर में श्वेत परी बन छिटको
मैं तारों का श्रृंगार गूंथ कर तुम्हें सजा दूं

मंगलवार, 22 मई 2012

फिर अपाहिज आश , हिमगिरि पार करना चाहती है

यह क्या मधुर स्वप्न सी झिलमिल, सदय ह्रदय में अधिक अधीर ।
व्याकुलता सी व्यक्त हो रही , आशा, बनकर प्राण समीर ।।
    ---जय शंकर प्रसाद










फिर अपाहिज आश , हिमगिरि पार करना चाहती है ।।

पत्थरों पर लुढ़कती है, कंटकों पर बिलखती है ।
पग कटे ले, रुदन करती, हिम शिलाओं पर चली है ।
पार- हिमगिरि, ढूंढने वह प्यार अपना, जा रही है ।
फिर अपाहिज आश , हिमगिरि पार करना चाहती है ।।

तीक्ष्ण नख से विवशता ने नोच डाला, उसे भूली ।
भाग्य ने भी द्रोह करके लाज लूटी, उसे भूली , ।
साथ साहस पुत्र लेकर, छल- भंवर में कूदती है ।
फिर अपाहिज आश , हिमगिरि पार करना चाहती है । ।

रूढि -वन के जंतु भीषण , ह्रदय में भय भर रहे हैं
स्वार्थ, कुत्सा, घृणा के सब सर्प फिर फिर डँस रहे हैं
घिसटती आशा को देखो, फिर भी आगे बढ़ रही है ।
फिर अपाहिज आश , हिमगिरि पार करना चाहती है ।।
-------------_----Kishore Nigam / 28-12-1974

ज्वालामुखी फटा --


ज्वालामुखी फटा --
दुनिया की आबादी का एक बड़ा हिस्सा
मौत का निवाला बन गया ।
करोड़ों और अरबों की तबाही अचानक हुयी ।

पर जानते भी हो , ज्वालामुखी क्यों फटते हैं ?


यही सवाल वैज्ञानिकों ने पूंछा था ज्वालामुखियों से ।
उसकी राख से, लावे से
और अपनी तर्क बुद्धि के कंप्यूटर से
और उत्तर वही है
जो हम सब जानते है
फिर भी भूल जाते हैं ।

सोमवार, 21 मई 2012

जा रहा फिर चाँद पाने मैं अपाहिज !

https://www.facebook.com/kishore.nigam1
जा रहा फिर चाँद पाने मैं अपाहिज !
निठुर धरती ने हैं मेरे पैर बांधे
बंध गए , तब पत्थरों ने तोड़ डाले
धूल भर दी वायु ने इन नेत्रों में
और बढ़कर शूल मारा सूर्य ने
किन्तु मैं उन्मत्त हूँ, है अभी मुझमें शेष जीवन ।। जा रहा ००००
डर रहा है चाँद भी क्यों आज मुझसे ?
छिप गया वह अंध तम की ओट में
हँस रहा था , डोरियाँ किरणों की फेंकी, कर इशारे ,
पर पकड़ जब इन्हें बढ़ता , वह छिपा जा बादलों में
मैं त्वरित स्पूतनिक सा , जा गिरूंगा चन्द्रतल पर ।। जा रहा ००००
धरणितल पर शूल रखकर मैं उठूँगा
शिलाओं को बज्र सर से तोड़ दूंगा
आँख अंधी हो गयी पर चाँद मन में है समाहित
सूर्य को भी रात्रि-आँचल से ढकूंगा
मूर्छित कर बादलों को , छीन लूँगा चाँद उनसे ।। जा रहा ०००००० 
                                     28/12/1974

ऐ ह्रदय ! तू गगन बन जा !



ऐ ह्रदय ! तू गगन बन जा !
नव- विचारों के विहग नव, नित उड़ें उन्मुक्त होकर
चटक रंगों से रंगे पंखों सहित बल खा रहे हों
तू इन्हें उल्लास दे जा , सहज-बुद्धि प्रकाश दे जा
अरे ! तू मेधा-पवन की फरफराहट सहज बन जा
ऐ ह्रदय ! तू पवन बन जा !




नित नया कर्दम समेटे , क्षुद्र सरिताएं भी आयें
मर्म पर आघात करती, वृहद् चट्टानें भी लायें
अरे ! तू चट्टान को खंडित करे, मोती बना जा
तू महा हिल्लोल लेता तरंगायित जलधि बन जा
ऐ ह्रदय तू जलधि बन जा !

खींच ले तू धरनि बन कर , सभी विषमय श्वांस जो हों
रोग दूषण के जनक , सड़ते , जगत के पाप जो हों
उर्वरक उनका बना , नव-पौध का पोषण बना जा
ऐ ह्रदय ! तू धरनि बन जा !



तुमुल कोलाहल जगत का , करुण-क्रंदन, रुदन जग का
नित विघटता स्वयं को, स्वर दुन्दुभी आघात का
लीन कर ले आत्म में तू, शौर्यमय नव शब्द बन जा
ऐ ह्रदय ! तू मुखर बन जा !


https://www.facebook.com/kishore.nigam1?ref=tn_tnmn 
उड़ा जा तू विघ्न पर्वत , कर शांत- सरिता तरंगायित
क्रूर-तरु, इन भाग्य- अंकों को तू जड़ से ही गिरा जा
आज अंधड़ लिए मन में , वात- चक्रित तड़ित बन जा
ऐ ह्रदय तू तड़ित बन जा





कुटिल विषधर सघन-वन से निकल कर जो डँस रहे हों
भाव-शिशुओं को जो हिंसक व्याघ्रादिक खा रहे हों
सघन वन को दाह करने अरे ! तू दावाग्नि बन जा !
ऐ ह्रदय ! दावाग्नि बन जा !


---------------------22/02/1974

शुक्रवार, 18 मई 2012

सजर

https://www.facebook.com/kishore.nigam1 

सजर= (ढेलेनुमा पत्थर, जिसके अन्दर जीवाश्म,एक नग जैसा बन जाता है )


मैं सजर हूँ ।

मैं सजर हूँ ।
मेरी भाषा मौन है ।
किन्तु इतना ही नहीं
मेरी आकृति भी तो है भाषा मेरी
जो दिखाती है, बताती है कहानी
युगों युगों से , गात पर मेरे पड़े ,
क्रूर लहरों के निर्दयी आघातों की ।
इन्हीं लहरों ने तराशा है मुझे
इन्हीं ने चिकनाहटें दीं,और गोलाकृति मुझे
किन्तु आँसू एक जो अंतस में मेरे है छिपा
बन गया जीवाश्म जो, देखोगे हीरे सा सजा
दे रहा आकार मेरे बाह्य-अंतस रूप को
है सहायक वो भी रचना में मेरे भूगोल की
और मेरी भौतिकी उसके ही बल पर है बनी ।
एक दिन जब चूरा-चूरा कर मुझे खंडित करोगे
पाके इस हीरे को , खुशियों से भरोगे
गले के इस हार में तुम पेंडुलम सा सजा लोगे
किन्तु देखो चोट जब करना मेरे दुखते ह्रदय पर
सधे हाथों से ही करना
सावधानी बरत लेना
टूट न जाए कहीं, मन में छिपा हीरा हमारा
टूट न जाए कहीं, मन में छिपा हीरा हमारा
            KN/19/05/2012


एक कर्मयोगी को सरित_ निमंत्रण


स्वेद बिंदु से गीला मस्तक , आज इसे तू जल में धो ले
पौरुष टूट रहा है तेरा , उजड़ चुका है तेरा डेरा
पास प्रकृति का सुन्दर घेरा , यह सब कुछ ही होगा तेरा
कुछ क्षण बहते शीतल जल से अपनी अंतस_ प्यास बुझा ले
स्वेद बिंदु से गीला मस्तक , आज इसे तू जल में धो ले

ऊपर सूरज , नीचे धरती, उठा बाहु आलिंगन करती
किरणों को अंतस में भरती , क्यों अपना उर शोषित करती ?
अरे ! किरण का जाल फ़ेंक कर , क्यों न इसे आलिंगित कर ले
स्वेद बिंदु से गीला मस्तक , आज इसे तू जल में धो ले

नीचे आग लपट ऊपर है पास यहीं छाया का वन है
पास यहीं तो नदिया बहती , कितना मधुरिम शीतल जल है
अरे उष्ण साँसों को जल में घोल घोल कर जीवन जी ले
स्वेद बिंदु से गीला मस्तक , आज इसे तू जल में धो ले

मांझी गीत सुनाता आता है , स्वर से दिशा गुंजाता आता
नदी पार तू खड़ा ताकता , यह लहरों को छलता आता
आ जा , उब डूब कर , जल की थाह , नाप कर मुझ को पा ले
स्वेद बिंदु से गीला मस्तक , आज इसे तू जल में धो

मैं जिन्दगी हूँ



मैं उफनती धार हूँ , मैं जिन्दगी हूँ
मैं नहीं साहिल , हूँ मैं मझधार , मैं बस जिन्दगी हूँ
डूबता सूरज नहाकर मेरे जल में, फिर उठेगा
याद का दीपक सुनहरी सांझ में फिर से जलेगा
आंसुओं की धार भी मुस्कान में ढलती रहेगी
और मुस्कानों की खेती अश्रु से सिंचती रहेगी
हर उपेक्षित भावना फिर से जगा दूँ, जिन्दगी हूँ
मैं उफनती धार हूँ , मैं जिन्दगी हूँ