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मंगलवार, 22 मई 2012

फिर अपाहिज आश , हिमगिरि पार करना चाहती है

यह क्या मधुर स्वप्न सी झिलमिल, सदय ह्रदय में अधिक अधीर ।
व्याकुलता सी व्यक्त हो रही , आशा, बनकर प्राण समीर ।।
    ---जय शंकर प्रसाद










फिर अपाहिज आश , हिमगिरि पार करना चाहती है ।।

पत्थरों पर लुढ़कती है, कंटकों पर बिलखती है ।
पग कटे ले, रुदन करती, हिम शिलाओं पर चली है ।
पार- हिमगिरि, ढूंढने वह प्यार अपना, जा रही है ।
फिर अपाहिज आश , हिमगिरि पार करना चाहती है ।।

तीक्ष्ण नख से विवशता ने नोच डाला, उसे भूली ।
भाग्य ने भी द्रोह करके लाज लूटी, उसे भूली , ।
साथ साहस पुत्र लेकर, छल- भंवर में कूदती है ।
फिर अपाहिज आश , हिमगिरि पार करना चाहती है । ।

रूढि -वन के जंतु भीषण , ह्रदय में भय भर रहे हैं
स्वार्थ, कुत्सा, घृणा के सब सर्प फिर फिर डँस रहे हैं
घिसटती आशा को देखो, फिर भी आगे बढ़ रही है ।
फिर अपाहिज आश , हिमगिरि पार करना चाहती है ।।
-------------_----Kishore Nigam / 28-12-1974

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