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शुक्रवार, 18 मई 2012

सजर

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सजर= (ढेलेनुमा पत्थर, जिसके अन्दर जीवाश्म,एक नग जैसा बन जाता है )


मैं सजर हूँ ।

मैं सजर हूँ ।
मेरी भाषा मौन है ।
किन्तु इतना ही नहीं
मेरी आकृति भी तो है भाषा मेरी
जो दिखाती है, बताती है कहानी
युगों युगों से , गात पर मेरे पड़े ,
क्रूर लहरों के निर्दयी आघातों की ।
इन्हीं लहरों ने तराशा है मुझे
इन्हीं ने चिकनाहटें दीं,और गोलाकृति मुझे
किन्तु आँसू एक जो अंतस में मेरे है छिपा
बन गया जीवाश्म जो, देखोगे हीरे सा सजा
दे रहा आकार मेरे बाह्य-अंतस रूप को
है सहायक वो भी रचना में मेरे भूगोल की
और मेरी भौतिकी उसके ही बल पर है बनी ।
एक दिन जब चूरा-चूरा कर मुझे खंडित करोगे
पाके इस हीरे को , खुशियों से भरोगे
गले के इस हार में तुम पेंडुलम सा सजा लोगे
किन्तु देखो चोट जब करना मेरे दुखते ह्रदय पर
सधे हाथों से ही करना
सावधानी बरत लेना
टूट न जाए कहीं, मन में छिपा हीरा हमारा
टूट न जाए कहीं, मन में छिपा हीरा हमारा
            KN/19/05/2012


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