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सोमवार, 21 मई 2012

ऐ ह्रदय ! तू गगन बन जा !



ऐ ह्रदय ! तू गगन बन जा !
नव- विचारों के विहग नव, नित उड़ें उन्मुक्त होकर
चटक रंगों से रंगे पंखों सहित बल खा रहे हों
तू इन्हें उल्लास दे जा , सहज-बुद्धि प्रकाश दे जा
अरे ! तू मेधा-पवन की फरफराहट सहज बन जा
ऐ ह्रदय ! तू पवन बन जा !




नित नया कर्दम समेटे , क्षुद्र सरिताएं भी आयें
मर्म पर आघात करती, वृहद् चट्टानें भी लायें
अरे ! तू चट्टान को खंडित करे, मोती बना जा
तू महा हिल्लोल लेता तरंगायित जलधि बन जा
ऐ ह्रदय तू जलधि बन जा !

खींच ले तू धरनि बन कर , सभी विषमय श्वांस जो हों
रोग दूषण के जनक , सड़ते , जगत के पाप जो हों
उर्वरक उनका बना , नव-पौध का पोषण बना जा
ऐ ह्रदय ! तू धरनि बन जा !



तुमुल कोलाहल जगत का , करुण-क्रंदन, रुदन जग का
नित विघटता स्वयं को, स्वर दुन्दुभी आघात का
लीन कर ले आत्म में तू, शौर्यमय नव शब्द बन जा
ऐ ह्रदय ! तू मुखर बन जा !


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उड़ा जा तू विघ्न पर्वत , कर शांत- सरिता तरंगायित
क्रूर-तरु, इन भाग्य- अंकों को तू जड़ से ही गिरा जा
आज अंधड़ लिए मन में , वात- चक्रित तड़ित बन जा
ऐ ह्रदय तू तड़ित बन जा





कुटिल विषधर सघन-वन से निकल कर जो डँस रहे हों
भाव-शिशुओं को जो हिंसक व्याघ्रादिक खा रहे हों
सघन वन को दाह करने अरे ! तू दावाग्नि बन जा !
ऐ ह्रदय ! दावाग्नि बन जा !


---------------------22/02/1974

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