चटक रंगों से रंगे पंखों सहित बल खा रहे हों
तू इन्हें उल्लास दे जा , सहज-बुद्धि प्रकाश दे जा
अरे ! तू मेधा-पवन की फरफराहट सहज बन जा
मर्म पर आघात करती, वृहद् चट्टानें भी लायें
अरे ! तू चट्टान को खंडित करे, मोती बना जा
तू महा हिल्लोल लेता तरंगायित जलधि बन जा
रोग दूषण के जनक , सड़ते , जगत के पाप जो हों
उर्वरक उनका बना , नव-पौध का पोषण बना जा
नित विघटता स्वयं को, स्वर दुन्दुभी आघात का
लीन कर ले आत्म में तू, शौर्यमय नव शब्द बन जा
ऐ ह्रदय ! तू मुखर बन जा !
तू इन्हें उल्लास दे जा , सहज-बुद्धि प्रकाश दे जा
अरे ! तू मेधा-पवन की फरफराहट सहज बन जा
ऐ ह्रदय ! तू पवन बन जा !
नित नया कर्दम समेटे , क्षुद्र सरिताएं भी आयें
मर्म पर आघात करती, वृहद् चट्टानें भी लायें
अरे ! तू चट्टान को खंडित करे, मोती बना जा
तू महा हिल्लोल लेता तरंगायित जलधि बन जा
खींच ले तू धरनि बन कर , सभी विषमय श्वांस जो हों
रोग दूषण के जनक , सड़ते , जगत के पाप जो हों
उर्वरक उनका बना , नव-पौध का पोषण बना जा
तुमुल कोलाहल जगत का , करुण-क्रंदन, रुदन जग का
नित विघटता स्वयं को, स्वर दुन्दुभी आघात का
लीन कर ले आत्म में तू, शौर्यमय नव शब्द बन जा
ऐ ह्रदय ! तू मुखर बन जा !
https://www.facebook.com/kishore.nigam1?ref=tn_tnmn उड़ा जा तू विघ्न पर्वत , कर शांत- सरिता तरंगायित
क्रूर-तरु, इन भाग्य- अंकों को तू जड़ से ही गिरा जा
आज अंधड़ लिए मन में , वात- चक्रित तड़ित बन जा
ऐ ह्रदय तू तड़ित बन जा !




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