एक कर्मयोगी को सरित_ निमंत्रण
स्वेद बिंदु से गीला मस्तक , आज इसे तू जल में धो ले
पौरुष टूट रहा है तेरा , उजड़ चुका है तेरा डेरा
पास प्रकृति का सुन्दर घेरा , यह सब कुछ ही होगा तेरा
कुछ क्षण बहते शीतल जल से अपनी अंतस_ प्यास बुझा ले
स्वेद बिंदु से गीला मस्तक , आज इसे तू जल में धो ले
ऊपर सूरज , नीचे धरती, उठा बाहु आलिंगन करती
किरणों को अंतस में भरती , क्यों अपना उर शोषित करती ?
अरे ! किरण का जाल फ़ेंक कर , क्यों न इसे आलिंगित कर ले
स्वेद बिंदु से गीला मस्तक , आज इसे तू जल में धो ले
नीचे आग लपट ऊपर है पास यहीं छाया का वन है
पास यहीं तो नदिया बहती , कितना मधुरिम शीतल जल है
अरे उष्ण साँसों को जल में घोल घोल कर जीवन जी ले
स्वेद बिंदु से गीला मस्तक , आज इसे तू जल में धो ले
मांझी गीत सुनाता आता है , स्वर से दिशा गुंजाता आता
नदी पार तू खड़ा ताकता , यह लहरों को छलता आता
आ जा , उब डूब कर , जल की थाह , नाप कर मुझ को पा ले
स्वेद बिंदु से गीला मस्तक , आज इसे तू जल में धो
इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएं