Silence is greater epic than Mahabharat ,which was often difficult to
understand even for the lord of wisdom,Ganesha. Speech is mostly, if
not always a tool to hide and incapable to express real feels
------------------------------------------------------------------- Kishore Nigam / 29-08-2011
मौन एक महाकाव्यघुटती विवसता का
घनीभूत पीड़ा का
झूंठे आरोपों का ,
स्वार्थी अपमानों का,
अपनों के धोखों का
अपनों की उपेक्षा का ,
अपनों के दर्दों का|
सत्ता की मदान्धता का ,
भाग्य के कुचक्रों का,
कुरीति- निर्दयता का
अंधविश्वासों की ,
बढाती हुयी सत्ता का
भीड़ की उन्मत्तता का ,
समर्थ की असमर्थता का ,
योग्य की असफलता का
भोग की निरर्थकता का
अंधों के निर्देशन का,
आत्म-परिवर्तन का
आत्मा की भौतिकता का ,
ईश्वर की अदृश्यता का
न्याय के अन्याय का
और मत्स्य न्याय का |
झॉँको गहराई में इसकी, तो मिलेगा
अगम सिंधु करता हुआ हाहाकारी अघोष-नाद |
गाता महाकाव्य, महाभारत से भी विशाल |
लिखने में जिसको न होंगे विनायक समर्थ |
जो कुछ लिखा गया है आजतक तो उसकी
पूर्ण व्याख्या कभी कोई भी न कर सका ,
ऋषि-वाक्य आज भी सब ही अस्पस्ष्ट हैं
शत- शत भाष्यों के सहस्रों भिन्न अर्थ हैं |
किन्तु मौन ही है , नहीं जिसमें कोई भिन्न अर्थ
छल, झूंठ, ढोंग, भ्रम, सबसे निरासक्त है ,
निश्छल हो परखो इसे, स्वार्थ में न तौलो इसे,
मौन हो पढ़ो इसे- -बस यही एक शर्त है |
--------------Kishore Nigam / ३०-०४-२०१७
अगम सिंधु करता हुआ हाहाकारी अघोष-नाद |
गाता महाकाव्य, महाभारत से भी विशाल |
लिखने में जिसको न होंगे विनायक समर्थ |
जो कुछ लिखा गया है आजतक तो उसकी
पूर्ण व्याख्या कभी कोई भी न कर सका ,
ऋषि-वाक्य आज भी सब ही अस्पस्ष्ट हैं
शत- शत भाष्यों के सहस्रों भिन्न अर्थ हैं |
किन्तु मौन ही है , नहीं जिसमें कोई भिन्न अर्थ
छल, झूंठ, ढोंग, भ्रम, सबसे निरासक्त है ,
निश्छल हो परखो इसे, स्वार्थ में न तौलो इसे,
मौन हो पढ़ो इसे- -बस यही एक शर्त है |
--------------Kishore Nigam / ३०-०४-२०१७

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