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शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

स्नेह की खोज



स्नेह की ही खोज में मैं क्या पता जाता कहाँ हूँ !

एक भिक्षा पात्र लेकर ,और खुद में मस्त हो कर
चल रहा अनजान पथ पर, संभलकर, फिर लड़खड़ाकर


क्या पता मंजिल कहाँ है , मैं तो केवल चल रहा हूँ
स्नेह की ही खोज में मैं क्या पता जाता कहाँ हूँ !

स्नेह मेरा ह्रदय भर कर , मुझे मेरा पथ दिखा कर
कंटकों की पीर हर, पहुँचा सकेगा लक्ष्य पर
सोच कर निकला यही था, और आगे बढ़ रहा हूँ
स्नेह की ही खोज में मैं क्या पता जाता कहाँ हूँ !

अब न मेरा लक्ष्य स्थिर, मात्र मेरा दर्द स्थिर
अब न मुझमें लगन स्थिर , मात्र मेरी प्यास स्थिर
भूल कर हर लक्ष्य ,इन उपलक्ष्य के प्रति बढ़ रहा हूँ
स्नेह की ही खोज में मैं क्या पता जाता कहाँ हूँ !

लोग हँसते देखकर हैं ,लोग भरते आह भी हैं
लोग भिक्षा पात्र में कुछ व्यर्थ कंकण डालते हैं
दया, छलना , वासना , उपदेश --क्या मैं चाहता हूँ
स्नेह की ही खोज में मैं क्या पता जाता कहाँ हूँ !

चाहता हूँ--स्नेह के धोखे मुझे तुम और छल लो
चाहता हूँ -- दर्द, असफलता, निराशा और भर दो
अरे ! जितना है गरल, कम है, मैं ज्यादा चाहता हूँ
स्नेह की ही खोज में मैं क्या पता जाता कहाँ हूँ !

स्वर उठे --"स्नेह ले लो " ",प्यार का विश्वास ले लो"
और मेरे हाथ में फिर निराशा अंगार दे दो
ठोकरें दो, घृणा दे दो , छल भरा अपमान दे दो
मैं सचेतन नहीं, फिर से जडित होना चाहता हूँ
स्नेह की ही खोज में मैं क्या पता जाता कहाँ हूँ !

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