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गुरुवार, 16 अगस्त 2012

तुम कौन हो ?

  हुआ था जब बिग बैंग

------(१९७३ के मेरे एक अपूर्ण गीत का अद्यतन रूपांतरण )

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  हुआ था जब बिग बैंग
और जन्मी थी यह सृष्टि
बताते हैं वैज्ञानिक .....
पता नहीं कितने अरबों वर्ष बाद
तब हुआ था जीवन का जन्म
मुझे भी कहाँ याद .?
जब भी हुआ था, तब ही सही ,
किन्तु जीवन के साथ ही तो
जन्मा था मैं भी।
मैं , जो देह नहीं , आत्मा हूँ .
किन्तु इतना है याद मुझे ,
की मेरे जन्म के साथ ही ,
शुरू हो गयी थी मेरी तलाश
तुम्हें खोजने की ।
तुम जो इस आत्मा के मस्तिष्क में छाये थे
दिखा रहे थे अपनी मन मोहक छवि
सुना रहे थे अपना मोहक संगीत ,
भर रहे थे मेरी आत्मा में अपनी सुगंधि ,
तुम्हारे स्पर्श की कल्पना करती थी
मेरे रोम-रोम को रोमांचित ,
तुम्हारी चेहरे का रंग ,
जैसे इन्द्रधनुष के सात रंग
हजारों अन्य रंगों में विभक्त हो गए हों ..
मैंने पूंछा था चीख-चीख कर ---
"क्या तुम ईश्वर हो ? "
बदले में तुम्हारे संगीतमय स्वर में
लौटा था मेरा ही प्रश्न --
"क्या तुम ईश्वर हो ?"
मैंने पूंछा था तब --"आखिर तुम कौन हो ?"
उत्तर मिला था , जैसे देवता गा रहे हों --
" मैं हूँ अपूर्ण , किन्तु तुम्हारी पूर्णता
और जान लो यह भी, तुम हो मेरी पूर्णता "
"कहाँ खोजूं तुम्हें ?" पूंछा था मैंने ---
उत्तर मिला नहीं, छाया अदृश्य हुयी .
खोज रहा हूँ बस तभी से तुमको ,
कितने जन्म, पुनर्जन्म ,
कितनी तड़प , बेचैनी,
कितनी ज्वाला, विषमय हाला ,
कितनी प्यास , तड़पती आश
कितने त्राश, जग के पाश ,
कितनी मरीचिका , कितनी विभीषिका
कितनी घृणा , कितने अपमान
सहे हैं इस आत्मा ने , तुम्हारी खोज में ,
पर क्या कभी मिले तुम ?
नहीं है तुम्हारा अस्तित्व कहीं भी .
हो तुम मात्र एक प्रेत-छाया .
कहती है मेरी हताशा , निराशा
मगर फिर क्यों , भला क्यों
आती हर क्षण आहट तुम्हारी ?
गूंजती कानों में हंसी तुम्हारी ?
गंध, भरती है नथुनों में मेरे ?
रोमांच होता है, जैसे तुमने अभी छुआ मुझे ?
तारक दलों के बीच हंसते से दिखते हो ?
बादलों की खिडकियों से इशारे करते हो ?
किन्तु दृष्टि उठते ही मेरी ,
कहाँ , कहाँ , कहाँ अदृश्य हो जाते हो ?
तुम कौन हो ?

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