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मन के है धारे दो ,
मन के है धारे दो
एक अपना आप,
एक प्राप्ति की अभीप्सा
मेल नहीं खाते
अपना आप और अपनी अभीप्सा
उसका अपना आप , अपनी चाहत
मेरा अपना आप आप , अपनी चाहत
मेल नहीं खाते
मेरे और उसके अपने अपने आप
चाहतें भले ही खा जाती हैं कभी मेल
कभी हम चाहतों को चुनते हैं
और कर लेते हैं अपने आप को बदरंग
कभी हम अपने आपे को चुनते हैं
और कर लेते हैं अपनी चाहतों को बदरंग
ईश्वर ने बनायीं ही प्रकृति है ऐसी
कि
जहां मिलती है पनाह ,
दर्द भी वहीँ मिलता है
साझा रिश्ता है जैसे इन दोनों का "
Kishore Nigam /25/04/2012
एक प्राप्ति की अभीप्सा
मेल नहीं खाते
अपना आप और अपनी अभीप्सा
उसका अपना आप , अपनी चाहत
मेरा अपना आप आप , अपनी चाहत
मेल नहीं खाते
मेरे और उसके अपने अपने आप
चाहतें भले ही खा जाती हैं कभी मेल
कभी हम चाहतों को चुनते हैं
और कर लेते हैं अपने आप को बदरंग
कभी हम अपने आपे को चुनते हैं
और कर लेते हैं अपनी चाहतों को बदरंग
ईश्वर ने बनायीं ही प्रकृति है ऐसी
दर्द भी वहीँ मिलता है
साझा रिश्ता है जैसे इन दोनों का "
Kishore Nigam /25/04/2012

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