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रविवार, 10 जून 2012

डूब आया मैं लहरों में ।




छोड़ सब भौतिक द्वंद्वों को

साथ लेकर पीड़ित मन को ,
डूब आया मैं लहरों में ।

कहाँ अब कुत्सा का वह जाल
कहाँ अब छलना का वह व्याल
कहाँ वह मन की तड़प कराल
कहाँ करुणा का छल छल ताल
उठा , सब को समेट ,रख अलग,
विहंस जागा तंद्रित अलसित ,
डूब आया मैं लहरों में ।

ताल में प्रतिबिंबित सुविशाल
सुदृढ़ मंदिर का गर्वित भाल
लहर में ज्यों बल खाता व्याल
कौन क्या --- कब गिनता है काल ?
सुदृढ़ता मन की सारी तोड़ ,
ध्वंश को निश्चिन्ता से जोड़
तैरता हूँ मैं लहरों में ।

प्रखर सूरज का तपता भाल
करे उसको मज्जित यह ताल
अभी तक वही रहा था शाल
बना पर आखिर पयस-मराल
छोड़कर सहज सूर्य का ताप
जलज की कोमलता ले साथ
काँपता हूँ मैं लहरों मैं

न कल होगा यह जलमय ताल
तप्त हो जाऊँगा तत्काल
प्रखरता रवि की जल में डाल
बनूँगा फिर लहरों का जाल


"चक्रवात भावों का उद्वेग
नहीं ऋजु जीवन की यह रेख
चक्रवात घटनाओं का लेख
पाप में पुण्य ,पुण्य में पाप
निहित दिखलाते सब अभिलेख
क्षणों में जीते हम निरुपाय
संस्कारों से पीड़ित हाय
नयी पीढ़ी अब चिंतित नित्य
एक जीवन की गति ही सत्य
मृत्यु है अंतिम जिसका लेख "
यही लेकर असार का सार
इसी दर्शन का लेकर भार
डूब जाता हूँ लहरों में
                                  Kishore Nigam /
                                 
Faizabad/             07/08/2012

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