दाता कभी भिक्षुक नहीं होता ,अधिक से अधिक अपने दान का प्रतिदान मांगता है
मैंने दी हैं निमौरियाँ ,औषधियों की स्रोत हैं जो
घनी छाया,शीतल पवन , चौपाल को और पंथियों को
दिए हैं घोंसले मैंने, भटकते पंछियों को ।
द्वार , खिड़की , कुर्सियां, ये मेजें और अलमारियां
सब बना लो, सब सजा लो, निष्प्राण होती देह से ।
जब कभी तपती दुपहरी की तपन बेचैन कर दे
देखना आषाढ़ के पहले दिवस सी आश देते
मेरे बीजों से उगे ,इन मेरी छाया में पले ,
प्राकृतिक वर्षा से, माता भूमि से पोषित हुए
सर उठाये गगन में ,नव -वृक्ष नव पल्लव धरे
ये तुम्हारी आश होंगे, ये तुम्हारे पास होंगे
ये तुम्हें उल्लास देंगे, ये तुम्हारी सांस होंगे, ।
जो नहीं उपयोज्य है , गन्दला सा एक लोटा जल
बस वही दे दो इन्हें ,उपकार के उपलक्ष्य में
यह तुम्हारा कृत्य बस सहयोग का वाचक बने
मान रह जाए तुम्हारा , और इन्हें जीवन मिले ।।

sach me nimouriyaan ...bahut sunder,,,garmee ki chuttiyaan ...garam hawayen,,,aur ham bhi kabhee neem ke pedon ke neeche halke hare rang ki nimouriyon se khelte they,,,,bahut sunder rachna sir,,,
जवाब देंहटाएंधन्यवाद सुमन . इन पंक्तियों में मैंने बूढ़े वृक्ष को वृद्ध व्यक्ति का प्रतीक बनाकर , और उसकी विरासत को नव वृक्षों का प्रतीक बनाकर , लकडहारे को वृद्ध की संतान का प्रतीक बनाया है. यद्यपि यह प्रतीकात्मकता कुछ उलटी पुलटी सी है,फिर भी शायद मेरे कथ्य को (जो दो पीढ़ियों के बीच संवाद रूप में है) कुछ सीमा तक स्पष्ट कर सकती है-- ऐसा विश्वास है.
हटाएंSundar Rachana.
जवाब देंहटाएंवाह्ह्ह बहुत सुन्दर
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