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रविवार, 10 जून 2012

ऐ सहरा के कैक्टस !

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कैक्टस (नागफनी )


"ऐ सहरा के कैक्टस !
कैसे कह सकते हो तुम "अमीत"
मैं भी तो हूँ इस सहरा में तुम्हारे साथ
न तुम तनहा हो , न मैं अमित्र
जो काँटा चुभाया है ,तुमने
क्या नहीं था वह
मित्रता के बढे हाथ का प्रतीक ?
तुम्हारी प्यास अधूरी है !
किन्तु इस अपार रेत- राशि के नीचे दबे जल- बिंदु
तुम्हारे जीवन को बनाए रखने के लिए ,
धरती के सबसे सुन्दर पुष्प तुममे खिलाने के लिए
दे रहे हैं तुम्हें सतत अपना जीवन-दान
क्या इस स्नेह से अधिक भी है कुछ वांछनीय ?
देखो तो मेरी ओर
जिसके प्यासे तड़पते होठों को
नहीं मिल सका जल का एक बिंदु
हर क्षण बढती यह प्यास
ले जायेगी जीवन के उस पार
नहीं जानता- क्या वहां भी होगी बस
प्यास ही प्यास
किन्तु बुझती आँखों में उस क्षण
रहेगा कृतज्ञता-भाव का एक जल बिंदु !
कृतज्ञता इस कांटे के रूप में
बढे हुए तुम्हारे
मैत्री के हाथ के प्रति ।
खारा ही सही , वह जल बिंदु ,
किन्तु आशा है बढ़ा देगा
तुम्हारे जीवन कि डोर को
कम से कम एक क्षण और
ऐ इस सहरा के मेरे मीत
सार्थक हो जायेगी हमारी प्रीत ।"

2 टिप्‍पणियां:

  1. मानव का व्यथित मन सच ही जीवन रुपी सहारा में उस एकाकी केक्टस से भी निरीह होता है ..यह किन्तु जब यह व्यथा किसी परिपक्व कवी के ह्रदय में महसूस की जाती है तो शब्दों के ऐसे मोती फुट पड़ते हैं , की जिससे पिरोई गयी माला साहित्य जगत में भावनाओं की एक निर्द्वन्द सरिता बहा देती है ...ये शब्द रचनाकार को मानस के उस हंस की तरह प्रस्तुत करते हैं जो केवल भावनाओं के मोती चुनता है ...चाहे वो भावना व्यथा या पीड़ा ही क्यूँ न हो ...

    सादर,
    उपेन्द्र दुबे

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    1. मनमोहक टिपण्णी के लिए अत्यंत आभार Upendra Dubey जी |

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