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गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

मैं प्रपात महा जल का !


मैं प्रपात महा जल का !                                               


कल्पना की नील स्वर्णिम
परी का आँचल नहीं हूँ ।
और न ही कल्पना का
मैं भयानक दैत्य हूँ ।।

वास्तविकता के धरातल पर उमड़ता ,
दृढ़ शिलाओं पर उफन कर चोट खाता ,
तोड़ता मैं रूढ़ियों को ,
स्वयं को बिखरा रहा हूँ !
ऊंचे हिमालय से हजारों हाथ नीचे ,
ह्रदय का भय दमन करके ,
बेझिझक मैं कूदता हूँ ,
अधः गति में चल रहा हूँ ।
कल्पना की नील स्वर्णिम
परी का आँचल नहीं हूँ
और न ही कल्पना का
मैं भयानक दैत्य हूँ ।।

यह अधः गति ,पहुँच समतल में सरित का ,
रूप दे देगी मुझे उपयोगितामय ।
यह अधः गति सींच खेतों को कभी ,
शस्य- श्यामल भूमि देगी जगत को ।
यह अधः गति ही पहुंचकर अंत में
महासागर अंक भी देगी मुझे ।
यह अधः गति निरर्थक जीवन अपाकृत
को बना देगी सनिश्चय सार्थक ।
तोड़ता मैं रूढ़ियों की जड़ शिलाएं , कूल-बंधन ,
उस अपरिमित पुनर्जीवन की दिशा में बढ़ रहा हूँ ।
कल्पना की नील स्वर्णिम परी का आँचल नहीं हूँ
और न ही कल्पना का मैं भयानक दैत्य हूँ ।।

रोक कब मुझको सका ,यह जगत निर्जन निरर्थक सा,
बाढ़ में हर बाँध को मैं तोड़ता बढ़ता रहा हूँ . ।.
जब कभी मैं बंधा सीमित से क्षणों को ,
शक्ति के आह्लाद का संचार मैं करता रहा हूँ ।
सूर्य ने बेंधा सहस्रों बाण से जब ,
विश्व पर मैं मेघ बन कर छा गया हूँ ।
और सत्ता सूर्य की भी ढांप कर कुछ क्षणों को ,
ओस, कुहरा, मेघ बन बरसा किया हूँ .।
इन्द्रधनु बन बंधनों में भी विहँसता ,
शांति से मिट, बरस , फिर नद बन गया हूँ ।
कल्पना की नील स्वर्णिम परी का आँचल नहीं हूँ
और न ही कल्पना का मैं भयानक दैत्य हूँ ।।

.................... किशोर निगम /२४.१२.१९७४

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4 टिप्‍पणियां:

  1. खूबसूरत पंक्तियाँ, वीर रस से सराबोर....मेरी प्रिय कविता

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  2. वाह ,,बहुत सुन्दर भाषा,खूबसूरत रचना,प्रकृति की परिपूर्णता लिए,,बधाई आपको

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  3. आदरणीय किशोर निगम जी आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आई सरी रचनाओं को पढ़ जीवन के विविध आयामों को प्रस्तुत करती शानदार रचनाएँ
    आशा पाण्डेय ओझा

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