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जा रहा फिर चाँद पाने मैं अपाहिज !
निठुर धरती ने हैं मेरे पैर बांधे
बंध गए , तब पत्थरों ने तोड़ डाले
धूल भर दी वायु ने इन नेत्रों में
और बढ़कर शूल मारा सूर्य ने
किन्तु मैं उन्मत्त हूँ, है अभी मुझमें शेष जीवन ।। जा रहा ००००
डर रहा है चाँद भी क्यों आज मुझसे ?
छिप गया वह अंध तम की ओट में
हँस रहा था , डोरियाँ किरणों की फेंकी, कर इशारे ,
पर पकड़ जब इन्हें बढ़ता , वह छिपा जा बादलों में
मैं त्वरित स्पूतनिक सा , जा गिरूंगा चन्द्रतल पर ।। जा रहा ००००
धरणितल पर शूल रखकर मैं उठूँगा
शिलाओं को बज्र सर से तोड़ दूंगा
आँख अंधी हो गयी पर चाँद मन में है समाहित
सूर्य को भी रात्रि-आँचल से ढकूंगा
मूर्छित कर बादलों को , छीन लूँगा चाँद उनसे ।। जा रहा ००००००
निठुर धरती ने हैं मेरे पैर बांधे
बंध गए , तब पत्थरों ने तोड़ डाले
धूल भर दी वायु ने इन नेत्रों में
और बढ़कर शूल मारा सूर्य ने
किन्तु मैं उन्मत्त हूँ, है अभी मुझमें शेष जीवन ।। जा रहा ००००
डर रहा है चाँद भी क्यों आज मुझसे ?
छिप गया वह अंध तम की ओट में
हँस रहा था , डोरियाँ किरणों की फेंकी, कर इशारे ,
पर पकड़ जब इन्हें बढ़ता , वह छिपा जा बादलों में
मैं त्वरित स्पूतनिक सा , जा गिरूंगा चन्द्रतल पर ।। जा रहा ००००
धरणितल पर शूल रखकर मैं उठूँगा
शिलाओं को बज्र सर से तोड़ दूंगा
आँख अंधी हो गयी पर चाँद मन में है समाहित
सूर्य को भी रात्रि-आँचल से ढकूंगा
मूर्छित कर बादलों को , छीन लूँगा चाँद उनसे ।। जा रहा ००००००
28/12/1974

"SURYA KO BHI RATREE ANCHAL SE DHKUNGA,MURSHIT KAR BADLO KO ,CHCHEEN LOONGA CHAND UNDE"HIRDAYE KI GAHRAIO SE LIKHI SUNDER BHAW LIYE BEHAD KHOOBSURAT RACHNA,NIGAM JI BADHAI HO.
जवाब देंहटाएंAmar Tak ji, Prashansa purn tippni aur protsahan ke liye aapka haardik aabhar .
हटाएंShivakishorekumar ji प्रशंसा के लिए बहुत आभार
जवाब देंहटाएंमन को छू लिया।
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