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सोमवार, 21 मई 2012

जा रहा फिर चाँद पाने मैं अपाहिज !

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जा रहा फिर चाँद पाने मैं अपाहिज !
निठुर धरती ने हैं मेरे पैर बांधे
बंध गए , तब पत्थरों ने तोड़ डाले
धूल भर दी वायु ने इन नेत्रों में
और बढ़कर शूल मारा सूर्य ने
किन्तु मैं उन्मत्त हूँ, है अभी मुझमें शेष जीवन ।। जा रहा ००००
डर रहा है चाँद भी क्यों आज मुझसे ?
छिप गया वह अंध तम की ओट में
हँस रहा था , डोरियाँ किरणों की फेंकी, कर इशारे ,
पर पकड़ जब इन्हें बढ़ता , वह छिपा जा बादलों में
मैं त्वरित स्पूतनिक सा , जा गिरूंगा चन्द्रतल पर ।। जा रहा ००००
धरणितल पर शूल रखकर मैं उठूँगा
शिलाओं को बज्र सर से तोड़ दूंगा
आँख अंधी हो गयी पर चाँद मन में है समाहित
सूर्य को भी रात्रि-आँचल से ढकूंगा
मूर्छित कर बादलों को , छीन लूँगा चाँद उनसे ।। जा रहा ०००००० 
                                     28/12/1974

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