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शुक्रवार, 18 मई 2012

मैं जिन्दगी हूँ



मैं उफनती धार हूँ , मैं जिन्दगी हूँ
मैं नहीं साहिल , हूँ मैं मझधार , मैं बस जिन्दगी हूँ
डूबता सूरज नहाकर मेरे जल में, फिर उठेगा
याद का दीपक सुनहरी सांझ में फिर से जलेगा
आंसुओं की धार भी मुस्कान में ढलती रहेगी
और मुस्कानों की खेती अश्रु से सिंचती रहेगी
हर उपेक्षित भावना फिर से जगा दूँ, जिन्दगी हूँ
मैं उफनती धार हूँ , मैं जिन्दगी हूँ

14 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर शब्दों से सजी सार्थक रचना |

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    1. मीनाक्षी पन्त जी ,प्रशंसा के लिए अति आभार

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    1. सुमन.रेनू जी ,प्रशंसा के लिए अति आभार

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    2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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    1. रचना को पसंद करने के लिए आभार त्रिलोकी नाथ जी

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  4. आशा है ,विश्वास है , जीवन कि जीवंतता है । उत्साह का संचार करता , अदम्य स्वभाव सहज ही आभिब्यक्त होता ! इन शब्दोँ के शिल्पि को मेरा अभिवादन और बिभिन्न रसोँ का नित नुतन स्वाद चखाने के लिए अनेक - अनेक धन्यवाद !

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    1. विशेष प्रोत्साहन देने हेतु अत्यंत आन्भार जय प्रकाश रजक जी

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  5. sundar aanklan sundar shabd ..sundar prastuti .....

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  6. महानुभाव, प्रोत्साहन के लिए आभार |

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  7. Kishore Bhai Ji aik uttam rachnaa - Bahut sunder - Bahut Badhiyaa - मैं उफनती धार हूँ , मैं जिन्दगी हूँ ....Khush Raho Ji....KK

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